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योगी सरकार में 8 महीने में ही यूपी मोदी के गुजरात को पछाड़ते हुए बना नंबर वन,अखिलेश के उड़े होश

लखनऊ : यूपी में एक वक़्त का इतना बुरा दौर चला था जब गन्ना किसानों की हालत बद्द से बदतर होती जा रही थी. पिछली सरकारों में हर दूसरे दिन गन्ना किसान के आत्महत्या की खबर आती रहती थी. तो कभी गन्ना किसानों के प्रदर्शन की खबर, तो कभी चीनी मीलों का पैसा न चुकाने की, ये सब आम बात थी. लेकिन अब मौजूदा योगी सरकार के केवल 8 महीने के अंदर ये चमत्कार हो रहा कि उत्तरप्रदेश ने विकसित राज्य गुजरात को पछाड़ते हुए नंबर वन बन गया है. यह खबर उन पिछली सरकारों को ज़रूर पढ़नी चाहिए जो गन्ना किसानों की आत्महत्या पर मौनव्रत रखकर इसके लिए केंद्र को ज़िम्मेदार ठहराते थे.


सीएम योगी राज में यूपी गुजरात को पिछड़ते हुए निकला सबसे आगे

अभी-अभी बहुत बड़ी खुशखबरी मिल रही है सीएम योगी के राज में उत्तर प्रदेश में इस साल गन्ना पेराई सत्र में अब तक शुगर रिकवरी के मामले में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना यहाँ तक की गुजरात और अन्य राज्यों को भी पछाड़ते हुए नंबर वन बन गया है. यही नहीं 2017-18 में अब तक रिकार्ड 2500.98 करोड़ गन्ना मूल्य का भुगतान हो चुका है. पिछले साल इसी अवधिक में 928.75 करोड़ का गन्ना मूल्य भुगतान हुआ था.

आपको बता दें ये कोई छोटी बात नहीं है प्रदेश के प्रमुख सचिव, चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास, संजय आर.भूसरेड्डी ने बताया कि अब तक प्रदेश में 15.98 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन हुआ है जबकि महाराष्ट्र में 6.81, कर्नाटक में 4.16 और गुजरात में 2.00 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन ही किया जा सका है.

गन्ना पेराई, चीनी उत्पादन और शुगर रिकवरी में सबसे आगे यूपी

बता दें कि सीएम योगी ने मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए निर्देशों के क्रम में यूपी में वर्तमान पेराई सत्र में चीनी मिलों का संचालन पिछले साल की अपेक्षा पहले कराया गया और इसी के परिणाम है कि यूपी इस साल अब तक गन्ना पेराई, चीनी उत्पादन और शुगर रिकवरी में आगे चल रहा है. प्रमुख सचिव ने बताया कि वर्तमान सत्र 2017-18 में अब तक संचालित 112 चीनी मिलों द्वारा 161.33 लाख टन गन्ने की पेराई सुनिश्चित कर 15.98 लाख टन चीनी का उत्पादन किया जा चुका है.योगी सरकार की शीर्ष प्राथमिकता के अनुसार गन्ना किसानों को त्वरित गन्ना मूल्य भुगतान कराने के निर्देश दिये गये हैं. यही वजह है की गन्ना मूल्य भुगतान में पिछले सभी सालों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.

अखिलेश सरकार में चीनी मिलों परकिसानों का 19000 करोड़ से ज़्यादा बकाया

अब आपको बताते हैं पिछली अखिलेश सरकार, मायवती सरकार में क्या हालत थी गन्ना किसानों की. NDTV की खबर अनुसार देशभर में चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का 19000 करोड़ से ज़्यादा बकाया था. आपको जानकार हैरानी होगी सिर्फ यूपी में चीनी मिलों का 9000 करोड़ से ज़्यादा की रकम बकाया था और फिर भी सरकार प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती थी. जिसका नतीजा क्या होता था वो भी देखिये ndtv की खबर के मुताबिक ही गन्ना किसानों के पास आत्महत्या करने के अलावा को चारा नहीं बचता था.


योगी सरकार की सख्ती से चीनी मीलों ने किसानों को किया भुगतान

लेकिन योगी सरकार ने आते ही सख्ती दिखाई जिसके बाद दोषी चीनी मिलों में से छह ने गन्ना किसानों के बकाए का भुगतान करना शुरू कर दिया. अकेली भेसानी मिल्स पर ही किसानों का 254 करोड़ रुपये बकाया था जो किसानों को वापस मिला. इसके बाद खेरी मिल्स के मालिकों ने भी किसानों का बकाया जल्द से जल्द भुगतान शुरू किया. इस मिल पर किसानों का करीब 17 करोड़ रुपये बकाया था.

अखिलेश सरकार में थम नहीं रहा था गन्ना किसानों की आत्महत्या का सिलसिला

वहीँ अखिलेश सरकार की गैर ज़िम्मेदार रवैय्ये के कारण गाना किसानों को आत्महत्या करनी पड़ती थी.पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बागपत के ढिकाना गांव के गन्ना किसान राहुल ने आर्थिक तंगी के चलते अपनी जान दे दी. राहुल के परिवार के पास 28 बीघे ज़मीन तो थी, लेकिन करीब 3 लाख रुपये चीनी मिल पर गन्ने का बकाया और करीब 3.5 लाख रुपये का बैंक का कर्ज. ऊपर से बहन की शादी तो दूर उसके इलाज के लिए पैसे भी नहीं थे.राहुल के बड़े भाई रुपेश कुमार ने कहा कि अब सुनने में आ रहा है कि प्रशासन हमको हमारे गन्ने का बकाया पेमेंट दिलवा रही है और ये कहते हुए उनकी आवाज़ भारी हो गई। अपनी रुंधी हुई आवाज में वह बोले कि जो मरेगा बस उसी का पेमेंट होगा क्या? हमको नहीं चाहिए ऐसा पेमेंट हमको हमारा भाई चाहिए बस.

ऐसे ही एक और गन्ना किसान थे रामबीर राठी. चीनी मिल ने गन्ने का बकाया दिया नहीं, बैंक से लोन मिला नहीं, घर के सारे गाए-भैंस बिक चुके थे, आर्थिक हालात खराब थे, वह तनाव में रहने लगा और आखिरकार उसने खुदकुशी कर ली. 40 साल के रामबीर राठी 11 बीघे में खेती करते थे। रामबीर की पत्नी मंजू के मुताबिक, ‘घर के आर्थिक हालात ठीक नहीं चल रहे थे और रामबीर काफी समय से तनाव में भी थे.रामबीर घर में अकेला कमाने वाला था और पांच लोगों को पालने के लिए खेती ही आमदनी का एकमात्र ज़रिया था. उसके घर की पूंजी माने जाने वाले सारे गाय-भैंस भी बिक गए.अब उसके पास बेचने को कुछ था नहीं, जिससे घर का खर्च चल जाए इसलिए मजबूर होकर उसने जान दे दी.परिवार का कहना है कि रामबीर अपनी बेटी को आईआईटी से इंजीनियर और बेटे को सेना में अफसर बनाना चाहता था.

इतनी गन्ना किसानों की आत्महत्या का ज़िम्मेदार क्या पिछली सरकारों को नहीं होना चाहिए. अगर उन्होंने अपनी तुष्टिकरण की राजनीती करने के बजाय गन्ना किसानो के लिए कुछ कदम उठाये होते तो वे गन्ना किसान आज ज़िंदा होते. जिन्हे आर्थिक तंगी में घुट-घुट के मरने से ज़्यादा आत्महत्या करना आसान लगा.


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