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जनता के बाद सुप्रीम कोर्ट भी बीजेपी के पक्ष में, कॉग्रेस को लगाया करारा तमाचा, सन्न रह गए राहुल

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नई दिल्ली : यूपी और उत्तराखंड चुनाव में करारी हार के बाद शुरू हुए कांग्रेस के दुर्दिन ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं. कांग्रेस को एक के बाद एक बड़े झटके लग रहे हैं. पहले जनता ने कांग्रेस को नकार दिया और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी बीजेपी का पक्ष लेते हुए कांग्रेस को जमकर फटकार लगा दी है.


कांग्रेस के सपनों पर बीजेपी ने मारी भांजी !

दरअसल गोवा में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाया. कांग्रेस ने गोवा में सबसे ज्यादा 17 सीटें हासिल की और वहीँ बीजेपी को कुल 13 सीटें ही मिल पायीं. यूपी और उत्तरखंड में हार के बाद जब कांग्रेस को लगा कि गोवा में कम से कम उनकी सरकार बनेगी तो उसमे भी बीजेपी ने भांजी मारते हुए खुद ही सरकार बनाने का दावा ठोक डाला.

राज्यपाल की ओर से बीजेपी को सरकार बनाने के लिए न्यौता भी मिल गया और मनोहर पर्रिकर गोवा के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने ही वाले हैं. इसे देखकर तिलमिलाई कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए कहा कि गोवा में सबसे बड़ी पार्टी तो वो है तो फिर राज्यपाल ने उसे सरकार बनाने का न्योता क्यों नहीं दिया?

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार !

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उलटा कांग्रेस को ही तगड़ी फटकार लगाई. कोर्ट ने पूछा कि यदि उनके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्याबल है तो फिर वो हाथ पर हाथ रख कर बैठे क्यों रहे? सीधे राज्यपाल के पास क्यों नहीं चले गए? आखिर वो किसका इंतज़ार कर रहे थे?

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि गोवा में आज ही शक्तिपरीक्षण किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने मनोहर पर्रिकर के शपथग्रहण पर रोक लगाने से साफ़ इनकार कर दिया. वैसे बात भी काफी सीधी सी है, मनोहर पर्रिकर के नाम पर अन्य छोटी पार्टियों और निर्दलीयों ने बीजेपी को समर्थन दे दिया. बीजेपी ने 21 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए बाकायदा उनके दस्तखत के साथ समर्थन पत्र राज्यपाल को दे दिया. क्योंकि बीजेपी ने पूरी प्रक्रिया को सही ढंग से पूरा किया इसलिए राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने भी बीजेपी को सरकार बनाने का न्यौता दे दिया.


याचिका के पीछे कोई और उद्देश्य तो नहीं ?

इसके ठीक उलट कांग्रेस ने विधायकों के समर्थन वाला पत्र राज्यपाल को भेजने की जगह राज्यपाल को पत्र भेजा कि क्योंकि सबसे बड़ी पार्टी वो हैं इसलिए सरकार बनाने के लिए पहले न्यौता उसे दिया जाना चाहिए. तो भई आपने समर्थन पत्र क्यों नहीं भिजवाया. इसके सीधे से दो ही मतलब निकलते हैं. या तो कांग्रेस को सरकार बनाने की प्रक्रिया के बार में पता ही नहीं, लेकिन देश पर 60 साल राज करने वाली पार्टी को ये ना पता हो वो तो संभव नहीं.

दूसरा मतलब ये निकलता है कि कांग्रेस के पास पर्याप्त विधायकों का समर्थन है ही नहीं, तो समर्थन पत्र कहाँ से भेजेंगे. तो क्या सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल कर सरकार बनाने की प्रक्रिया में बाधा डालने के पीछे कांग्रेस का उद्देश्य ये था कि विधायकों की खरीद-फरोख्त करके उन्हें अपने पाले में शामिल करने के लिए थोड़ा वक़्त जुटा पाएं?

कांग्रेस विधायकों का आलाकमान पर हमला !

सबसे बड़ी बात तो ये है कि कांग्रेस के विधायक भी मानते है कि सारी गलती उनकी पार्टी की आलाकमान की ही है. इस मुद्दे पर कांग्रेस ने संसद में हंगामा जरूर किया लेकिन कांग्रेस के विधायक तो इसके लिए अपनी पार्टी को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. कांग्रेस विधायक विश्वजीत राणे ने माना कि गोवा में सरकार बनाने को लेकर कांग्रेस आलाकमान ने गलती की. उन्होंने वक़्त रहते फैसला नहीं लिया.

अपनी खीज जाहिर करते हुए उन्हने कहा कि कांग्रेस के पास 17 विधायक है फिर भी आलाकमान के देर से फैसले लेने के कारण हम सरकार नहीं बना पा रहे.
कुल मिलाकर जो भी उद्देश्य रहा हो लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कुछ होने नहीं दिया और अब गोवा में मनोहर पर्रिकर की सरकार बनने जा रही है.


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