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ब्रेकिंग : सुप्रीम कोर्ट ने लिया हिंदुओं के खिलाफ बड़ा फैसला, दिल्ली में मोदी-शाह की उड़ गई नींद

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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने आज वामपंथियों के पक्ष में एक बेहद हैरान कर देने वाला फैसला सुनाया है. यकीन मानिये आप भी इस फैसले से दंग रह जाएंगे. जातियों में बनते हुए हिन्दुओं की आस्था पर एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चोट की गयी है और इसके पीछे कारण दिया गया है बढ़ता प्रदूषण. जी हाँ, इस पूरी खबर को पढ़कर आपको पता चलेगा कि कैसे देश में हिन्दुओं के खिलाफ साजिश के तहत बड़ी ताकतें काम कर रही हैं.


दिवाली पर पटाखों पर बैन, क्रिसमस व् नए साल पर नहीं

दिल्ली और एनसीआर में इस बार आपको बिना पटाखे के दिवाली मनानी पड़ेगी. प्रदूषण बहुत फैल रहा है, ये कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ पटाखों की बिक्री पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने कहा है कि प्रदूषण के स्तर को देखने के बाद इस पर आगे फैसला किया जाएगा.

वैसे बहुत अच्छी बात है कि माननीय अदालत को पर्यावरण की चिंता हो रही है. मगर आपको जानकार हैरानी होगी कि पटाखों पर लगी ये रोक केवल 1 नवम्बर तक ही है. यानी केवल दिवाली पर पटाखे नहीं जला सकते आप, उसके बाद क्रिसमस व् नए साल के उपलक्ष में जमकर आतिशबाजी कर सकते हैं. लेकिन आइये इसी सिलसिले में थोड़ी और बात कि जाए, हालांकि हमारी बात सुनने से कई लोग हमपर असहिष्णुता का आरोप लगाएंगे मगर हम तो बोलेंगे.

सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलता है बीफ से

सवाल ये है कि ये रोक क्यों केवल दिवाली के लिए ही लगाई गयी है? क्यों इस रोक को आगे तक नहीं बढ़ाया गया ताकि बाकी त्योहारों पर भी प्रदूषण ना फेल सके, या फिर मी लार्ड को लगता है बाकी त्योहारों पर पटाखे प्रदूषण फैलाते ही नहीं. केवल होली पर ही पानी की बर्बादी होती है, बकरीद पर जानवरों का खून साफ़ करने में नहीं?

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के मुताबिक गोमांस जलवायु के लिए बेहद खतरनाक है, बीफ के लिए पाले गए पशु मीथेन का उत्सर्जन ज्यादा करते हैं, जिससे जबरदस्त वायु प्रदूषण होता है. इसके अलावा कत्लखानों में जल प्रदूषण भी होता है. ऐसी व् कारों से भी सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है लेकिन सभी वामपंथी हिन्दुओं के त्योहारों पर जाग जाते हैं और हैरानी की बात है कि कोर्ट भी इन्ही लोगों का साथ देता है.


अपने ही देश में साजिश का शिकार हिन्दू

बंगाल में दुर्गा विसर्जन से पहले इजाजत लेनी पड़ती है, हर साल कोर्ट जा कर त्यौहार मनाने की इजाजत लेनी पड़ती है. दशहरे पर जुलूस नहीं निकाल सकते. आपको जानकार हैरानी होगी कि बीफ खाने को अधिकार बताने वाले सुप्रीम कोर्ट ने दक्षिण भारत के त्यौहार ‘जल्लीकट्टू’ इस साल बैन लगा दिया था.

जीव-जंतुओं से प्रेम करने वाले भला इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं? लिहाजा इसे रुकवाने के लिए मुकदमे किये गए और आखिरकार इसे रोक दिया गया था. वो तो भला हो मोदी सरकार का, जिसने आर्डिनेंस लाकर त्यौहार मनाने पर लगी औरंगजेबी रोक को हटा दिया.

‘दिवाली’ पर हायतौबा, बकरीद, क्रिसमस पर चुप्पी

पिछले साल बकरीद के मौके पर ढाका की सड़कों पर बहती खून की नदी की फोटोज तो सभी ने देखी. भारत में तो इससे भी बड़ी नदी बहती दिखाई देती, मगर हमारे यहाँ बारिश नहीं हुई और यदि हो भी जाती तब भी नहीं दिखती क्योंकि हमारा सीवेज सिस्टम बांग्लादेश से तो बेहतर ही है. पर क्या सिर्फ ना दिखने से इस सच को झुठलाया जा सकता है कि हर बकरीद लाखों बेजुबान जानवरों को एक खास समुदाय के कुछ घंटों की ख़ुशी के लिए जान से मार दिया जाता है. माफ़ कीजियेगा उन्हें मारा नहीं जाता है बल्कि हलाल किया जाता है. हलाल करना क्या होता है ये तो आप जानते ही होंगे, गर्दन पर धीरे-धीरे छुरी चलाना ताकि तड़प-तड़प के मरे जीव. वैसे अब तक तो हम असहिष्णु हो ही गए होंगे, लेकिन आइये थोड़ा और आगे बढ़ते हैं.

वहीँ कभी क्रिसमस या नए साल को मनाते वक्त आतिशबाजी पर बैन की बात सुनने को नहीं मिलती. वामपंथी आराम से पटाखे चलाते हैं, देश से प्रदूषण एकदम से गायब हो जाता है. देखिये कितने मजे की बात है कि इस बारे में ना तो कभी कोई सरकारी फरमान आता है ना ही कोर्ट का आदेश. यहां तक कि जानवरों के नाम पर दुनिया भर में नौटंकी करने वाली संस्था पेटा भी ऐसे गायब हो जाती है जैसे गधे के सिर से सींग. सब कुछ बहुत ही आराम से हो जाता है और किसी को कोई फर्क पड़ता.


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