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राम मंदिर पर अहम् सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया बेहद हैरतअंगेज़ फैसला, राम भक्तों को लगा बड़ा झटका, कांग्रेस की बड़ी साज़िश

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नई दिल्ली : राम मंदिर का मुद्दा जहाँ सुप्रीम कोर्ट में लम्बे वक़्त से चला आ रहा है. सबरीमाला मंदिर जो की एक आस्था का विषय है उस जैसे केस की तुरंत सुनवाई हो जाती है, आतंकियों के लिए आधी रात को भी सुप्रीम कोर्ट खुल जाते हैं. तो वहीँ आज फिर सुप्रीम कोर्ट का राम मंदिर पर फैसला आया है.


अभी मिल रही बड़ी खबर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष राजनीतिक रूप से संवेदनशील अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले पर सुनवाई शुरू होते ही चीफ जस्टिस रंजन गोगाई ने कहा कि आज सिर्फ सुनवाई की तारीख तय की जाएगी.

इस बीच मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन के द्वारा संविधान पीठ और जस्टिस यूयू ललित पर सवाल खड़े करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी तक मामले को टाल दिया है. अब पांच जजों की पीठ में जस्टिस यूयू ललित शामिल नहीं होंगे, और नई बेंच का गठन किया जाएगा.

बिलकुल ठीक वैसा ही हो रहा है जैसे कांग्रेस कपिल सिब्बल चाहते थे. तारिख पर तारिख आगे खिसकायी जा रही है ताकि किसी तरह लोकसभा चुनाव के बाद तक राम मंदिर के मसले को खींचा जा सके. यही मांग कपिल सिब्बल ने भी 2018 में कोर्ट में उठायी थी और कहा था कि इसका फैसला सीधा लोकसभा चुनाव के बाद किया जाय और आजु यही हो रहा है.

राजीव धवन ने इसके अलावा संविधान पीठ पर भी सवाल उठा दिया, उन्होंने कहा कि ये मामला पहले 3 जजों की पीठ के पास था लेकिन अचानक 5 जजों की पीठ के सामने मामला गया जिसको लेकर कोई न्यायिक आदेश जारी नहीं किया गया. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान पीठ का गठन करना चीफ जस्टिस का अधिकार है.


बता दें कि यह पीठ इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली इस 5 सदस्यीय संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में जस्टिस एस. ए. बोबडे, जस्टिस एन. वी. रमण, जस्टिस उदय यू ललित और जस्टिस धनन्जय वाई. चंद्रचूड़ शामिल हैं.

जब मामला 4 जनवरी को सुनवाई के लिए आया था तो इस बात का कोई संकेत नहीं था कि भूमि विवाद मामले को संविधान पीठ को भेजा जाएगा क्योंकि शीर्ष अदालत ने बस इतना कहा था कि इस मामले में गठित होने वाली उचित बेंच 10 जनवरी को अगला आदेश देगी.

गौरतलब है कि अयोध्या में राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित 2.77 एकड़ भूमि के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के 30 सितंबर, 2010 के 2:1 के बहुमत के फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में 14 अपीलें दायर की गई हैं.

हाई कोर्ट ने इस फैसले में विवादित भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान के बीच बराबर- बराबर बांटने का आदेश दिया था. इस फैसले के खिलाफ अपील दायर होने पर शीर्ष अदालत ने मई 2011 में हाई कोर्ट के निर्णय पर रोक लगाने के साथ ही विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था.


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