Home > ख़बरें > गोरखपुर हादसे के बाद रोहित वेमुला मामले में हुआ खुलासा आपको हिला कर रख देगा, जीत गए मोदी

गोरखपुर हादसे के बाद रोहित वेमुला मामले में हुआ खुलासा आपको हिला कर रख देगा, जीत गए मोदी

rohith-vemula-media-lies

नई दिल्ली : अभी हाल ही में आपने देखा कि कैसे देश के मीडिया ने गैर-जिम्मेदाराना तरीके से गोरखपुर बीआरडी कॉलेज हादसे की रिपोर्टिंग की. यहाँ तक कि ख़बरें तो ये भी आयीं कि साजिश के तहत सीएम योगी को बदनाम किया गया. अब ऐसी ही एक बेहद हैरान कर देने वाली खबर हैदराबाद से आ रही है, जिससे मीडिया की विश्वसनीयता जीरो हो गयी है. (सबूत पोस्ट के अंत में देखिये)

पकड़ा गया मीडिया का एक और सफ़ेद झूठ !

यकीन मानिये, इस खबर के बाद आप भी मीडिया की किसी भी बात पर भरोसा करने से पहले सौ बार सोचेंगे. आपको याद होगा कि कुछ ही वक़्त पहले हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की खबर सामने आयी थी. जिसके बाद मीडिया ने बिना किसी जांच-पड़ताल के तुरंत रोहित वेमुला दलित घोषित करते हुए मोदी सरकार पर कीचड उछालना शुरू कर दिया था.

इसके बाद राहुल गांधी से लेकर केजरीवाल तक सभी नेताओं ने जमकर इस खबर को अपनी राजनीति के लिए इस्तमाल किया. लेकिन अब रोहित वेमुला की मौत के मामले में सच्चाई सामने आ गई है. इस मामले की जांच के लिए बनी जस्टिस अशोक कुमार रुपनवाल की रिपोर्ट सामने आ गई है, जिसमे चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. रोहित वेमुला के दोस्तों, शिक्षकों, परिवारजनों और अन्य सभी पक्षों से बातचीत और सभी तथ्यों की छानबीन के बाद इस रिपोर्ट को तैयार किया गया है.

झूठी रिपोर्टिंग करती है देश की मीडिया ?

रिपोर्ट के मुताबिक़ रोहित ने सजा के कारण नहीं, बल्कि अपने निजी कारणों के चलते आत्महत्या की थी. जस्टिस रुपनवाल ने सभी तथ्यों का विस्तार से जिक्र करते हुए बताया है कि रोहित वेमुला दरअसल दलित था ही नहीं, बल्कि वो तो ओबीसी था. मन ही मन उसे इस बात का डर सताता रहता था कि किसी ना किसी दिन दलित होने का उसका झूठ खुल जाएगा और उसका करियर व् जिंदगी तबाह हो जाएगी. इसी वजह से वो मानसिक तनाव में रहता था.

याकूब मेमन की फांसी का विरोध कर रहा था रोहित ?

यूजीसी यानी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन को ये रिपोर्ट लगभग एक वर्ष पहले ही मिल गई थी. लेकिन इसे अब जा कर सार्वजनिक किया गया है. रिपोर्ट में जो बात सामने आयी है, वो मीडिया द्वारा किये जा रहे दावों से बिलकुल उलट है. एनडीटीवी ने तो इस मामले में सबसे ज्यादा हल्ला मचाया था और मोदी सरकार के खिलाफ खूब जहर उगला था.

रुपनवाल आयोग को जांच करनी थी कि रोहित ने आत्महत्या क्या विश्वविद्यालय की तरफ से हुई किसी गलती की वजह से की थी? यदि हां तो इसकी जिम्मेदारी तय की जाए. इसके अलावा ये भी बताना था कि अन्य छात्रों के लिए शिकायत तंत्र को कैसे मजबूत बनाया जाए.

जस्टिस रुपनवाल ने रिपोर्ट में बताया है कि रोहित वेमुला और उसके साथी आतंकी याकूब मेमन को फांसी दिए जाने का विरोध कर रहे थे. जिसके बाद कुछ अन्य विद्यार्थियों द्वारा विरोध किये जाने पर उन्होंने उनके साथ जमकर मारपीट भी की. जिसके कारण युनिवेर्सिटी ने उन्हें हॉस्टल से निकाल दिया था. निकाले जाने के बाद इन सभी ने यूनिवर्सिटी के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. इसलिए ये मानना गलत होगा कि सज़ा के कारण रोहित ने आत्महत्या की.


रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि रोहित वेमुला उन कारणों से उलझन में था, जिन्हें वो खुद बेहतर जानता था. उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि “प्यार, दर्द, जिंदगी और मौत समझने का कोई आग्रह नहीं है.” इसके अलावा यूनिवर्सिटी की सज़ा का उसने कहीं कोई जिक्र तक नहीं किया है.

रोहित वेमुला की मां ने भी बोला झूठ !

रुपनवाल रिपोर्ट में रोहित वेमुला की जाति को लेकर उठे विवाद पर भी विस्तार से बताया गया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि रोहित दलित था ही नहीं, बल्कि ओबीसी क्लास से था. उसके पिता मणि कुमार वडेरा समुदाय से थे. ऐसे में कानूनी तौर पर उसका दलित प्रमाणपत्र बन ही नहीं सकता. यानी साफ़ है कि उसका दलित प्रमाणपत्र जाली है.

रोहित की मां ने दावा किया था कि वो माला समुदाय से हैं, जो अनुसूचित जाति में आता है और उन्होंने अपने पति से तलाक लिया हुआ है. हालांकि वो अपने दावे के पक्ष में कोई सबूत या कागजात पेश नहीं कर पाईं. न्यायिक आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक़ रोहित वेमुला की मां इस मामले में शुरू से ही झूठ बोल रही हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी के अधिकारियों को ही नहीं, बल्कि जांच आयोग को भी गुमराह करने की भी पूरी कोशिश की.

मोदी सरकार का कोई लेना-देना नहीं

जस्टिस रुपनवाल की रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और स्मृति ईरानी का इस मामले से कोई लेना-देना तक नहीं है. अगस्त 2015 के पहले हफ्ते में हैदराबाद के स्थानीय विधायक रामचंद्र राव दत्तात्रेय ने उनसे मुलाक़ात की थी और यूनिवर्सिटी की घटनाओं पर जांच के लिए अनुरोध किया था. जिसके बाद दत्तात्रेय ने उनकी चिट्ठी को स्मृति ईरानी को भेज दिया था, स्मृति ईरानी के ऑफिस ने उस चिट्ठी को युनिवेर्सिटी को भेज दिया. जोकि एक सामान्य प्रक्रिया है, ऐसे में उन्हें इसके लिए जिम्मेदार ठहराने का कोई तुक ही नहीं है.

यानी स्पष्ट है कि एक राजनीतिक साजिश के तहत मोदी सरकार पर कीचड उछालने के लिए नेताओं द्वारा मीडिया को मैनेज किया गया. ठीक वैसे ही जैसे गोरखपुर हादसे में भी किया गया लेकिन पोल आखिरकार खुल ही गयी. ऐसे में अब सवाल उठने शुरू हो गए हैं कि मोदी सरकार से नफरत के चलते मीडिया ने आखिर और कौन-कौन से झूठ देश की जनता से बोले हैं? सोशल मीडिया नहीं होता, तो इन दोनों ही मामलों में सच शायद कभी सामने आ ही नहीं पाता.

अब कहाँ मुँह छुपायेंगे रवीश कुमार ?


इस न्यूज़ को अपने मित्रों के साथ शेयर करना न भूलें। आपकी सुविधा के लिए शेयर बटन्स नीचे दिए गए हैं।
सब्सक्राइब करें हमारा यू-ट्यूब चैनल


हिंदी न्यूज़ से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमारा फेसबुक पेज लाइक करें


फेसबुक पेज लाइक करें

loading...

Comments