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राहुल गांधी और चीन के कनेक्शन का सच आया सामने, खुफिया एजेंसियों के साथ मोदी के भी उड़े होश

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नई दिल्ली : चीन के साथ सिक्किम में सीमा विवाद चल रहा है और नौबत यहाँ तक पहुंच चुकी है कि दोनों देशों की सेनाएं तक आमने-सामने खड़ी हैं. ऐसे नाजुक वक़्त में राहुल गाँधी का चीन के राजदूत से चोरी-छिपे मिलने का रहस्य गहराता जा रहा है. मीडिया में अब जो बातें सामने आ रही हैं, उनपर तो यकीन करना तक मुश्किल होता जा रहा है.

चुनाव जीतने के लिए देश का सौदा ?

दरअसल मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ संदेह जताया जा रहा है कि राहुल की ये मुलाक़ात कहीं 2019 के लोकसभा चुनाव के सिलसिले में तो नहीं थी. दरअसल केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से सबसे ज्यादा परेशान कांग्रेस ही है, जो हर चुनाव हारती चली जा रही है. वहीँ पीएम मोदी की मेक इन इंडिया पॉलिसी से चीन सबसे ज्यादा परेशान है क्योंकि इसके दमपर भारत दुनिया भर में चीन का विकल्प बनकर उभर रहा है.

कई बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों ने तो चीन की जगह भारत में अपना प्रोडक्शन यूनिट बनाने का फैसला किया है. वहीँ पीएम मोदी के न्रेतत्व में भारत की आसियान देशों और अमेरिका, इजराइल से बढ़ती नजदीकी भी चीन को हजम नहीं हो रही है. ऐसे में दिल्ली के सियासी गलियारों में ये चर्चा गर्म है कि राहुल की चीनी राजदूत से मुलाक़ात अगले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ही हुई है.

ऐसा मानने के पीछे मुख्य वजह ये भी है कि राहुल ने मुलाकात से पहले विदेश मंत्रालय को औपचारिक जानकारी तक नहीं दी, जबकि ऐसा करना जरूरी होता है क्योंकि राहुल गांधी विपक्ष के नेता भी नहीं हैं. देश की राजनीति में उनकी हैसियत केवल एक साधारण सांसद की है.

कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने मीडिया से निजी बातचीत के दौरान इस बात की पुष्टि भी की है कि राहुल की चीनी राजदूत से मुलाक़ात किसी औपचारिक या आधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था. इसी के चलते दूतावास की ओर से जारी की गयी जानकारी में इस मुलाकात का कारण ही नहीं बताया गया. दूतावास की वेबसाइट ने इस मुलाकात की जानकारी पोस्ट कर दी, तब जाकर इसकी पोल खुली.

पहले चोरी, फिर सीनाजोरी

देश के साथ इतने बड़े विश्वासघात की पोल खुलते देख हड़बड़ी और घबराहट में पहले तो कांग्रेस ने इस खबर को ही नकार दिया लेकिन जब लगा कि अब तो पोल खुल चुकी है तो 9 घंटे बाद पार्टी ने मुलाकात होने की बात मानी. लेकिन हर बार की तरह इस बार भी सीनाजोरी पर उतर आयी. राहुल ने मुलाक़ात की बात को घुमाते हुए कहा कि वो पीएम मोदी की तरह चीनी राष्ट्रपति के साथ झूला नहीं झूल रहे थे.


मतलब पहले तो चोरी-छिपे मुलाक़ात की और फिर सफ़ेद झूठ बोला. उसके बाद जब चोरी पकड़ी गयी तब दबाव पड़ने पर चोरी कबूलना और बौखला कर जवाब देना, ये जाहिर करता है कि कुछ तो गड़बड़ है. इससे पहले राहुल गांधी के दफ्तर ने चीन दूतावास में फोन करके उस वेबसाइट लिंक को भी हटवा दिया था, जिसमे मुलाक़ात के बारे में कहा गया था.

मोदी की छवि धूमिल करने की साजिश ?

बताया जा रहा है कि देश की राजनीति में लगतार जमीन खोती जा रही कांग्रेस ने कुछ ही दिन पहले मोदी सरकार के कामकाज पर एक आंतरिक समीक्षा करवाई थी. इसमें ये बात सामने आयी कि बीजेपी को लगातार मिल रही जीत का सबसे बड़ा कारण जनता के बीच पीएम नरेंद्र मोदी की छवि है. जनता उन्हें मजबूत और कड़े फैसले लेने वाले भरोसेमंद नेता के तौर पर देखती है और उनपर विशवास करती है.

इस रिपोर्ट पर हुई समीक्षा में तय किया गया कि अगले लोकसभा चुनाव तक सारा फोकस मोदी के ‘मजबूत नेता’ वाली छवि को बिगाड़ने पर होगा. इसी के चलते पीएम मोदी के इजराइल दौरे के दौरान राहुल गांधी ने बयान दिया कि ‘मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप से मुलाकात में वीज़ा का मसला नहीं उठाया.’ आमतौर पर जब देश के प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर होते हैं तो विपक्ष के नेता ऐसे बयान देने से बचते हैं लेकिन मोदी को एक कमजोर पीएम के रूप में दिखाने के लिए ऐसा दकियानूसी बयान दिया गया.

चीन की मदद मांगने गए थे ?

राहुल की मुलाक़ात के पीछे सवाल ये भी है कि सभी जानते हैं कि राहुल को इंटरनेशनल डिप्लोमेसी की कोई समझ तो है नहीं. तो फिर वो आखिर वहां करने क्या गए थे? कहीं ऐसा तो नहीं कि चीन से मदद मांगी गई है कि वो देश के किसी छोटे हिस्से पर हमला करके कब्जा कर ले. ताकि कांग्रेस सड़क से लेकर संसद तक मोदी को आसानी से कमजोर प्रधानमंत्री साबित कर सके.

वैसे बता दें कि इससे पहले एक और बेशर्म कोंग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर, मोदी सरकार को हारने के लिए ऐसी ही मदद पाकिस्तान से भी मांग चुका है. भारत में चीन का दूतावास शुरू से ही ऐसी ही भूमिका में रहा है, 1949 और 1962 में कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई की मदद से चीन ऐसी कोशिश कर भी चुका है. ऐसे में यदि मोदी सरकार अगला चुनाव हार जाती है तो इसमें सारा फायदा कांग्रेस के साथ चीन का भी होगा. विस्तारवाद के साथ-साथ मेक इन इंडिया के कमजोर पड़ने से चीन की चांदी ही चांदी हो जायेगी और कांग्रेस को सत्ता में आकर अरबों के घोटाले करने का एक और मौक़ा मिल जाएगा.


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