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पीएम मोदी फिर आये एक्शन में, नोटबंदी के बाद देश को हिलाने वाला एक और फरमान जारी


नयी दिल्ली : भ्रष्टाचार ने आज हमारे देश की जड़ों को अंदर तक खोखला कर दिया है. भ्रष्टाचार से इंसान सार्वजनिक संपत्ति, ताक़त और सत्ता का गलत इस्तेमाल अपनी आत्म संतुष्टि और निजी स्वार्थ की प्राप्ति के लिये करता है. साथ ही इसमें सरकारी नियम-कानूनों की धज्जियाँ उड़ाकर फायदा पाने की कोशिश होती है. पिछले साल मोदी सरकार के नोटबंदी के एलान के बाद कालेधन और भ्रष्टाचार से लिप्त कुबेरों के पास पड़ा लाखों करोड़ों का जमा काला धन रद्दी में बदल गया था. इसी के बाद एक बार अब फिर मोदी सरकार ने फिर से भ्रष्टाचार पर ज़बरदस्त फैसला लिया है. इसी के चलते केंद्र में मोदी सरकार ने अब भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए 50 साल पुराने कानून को बदल कर नया सख्त कानून बनाया है जिससे भ्रष्टाचारी एक नहीं सौ बार सोचेगा.

6 महीने के अंदर भ्रष्टाचारी को मिलेगी सजा, अब तक नहीं थी कोइ समय सीमा

सभी सरकारी विभागों में भ्रष्ट कर्मचारियों को लेकर मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. ख़बरों के अनुसार मोदी सरकार ने 50 साल पुराने कानून को बदलते हुए अब अपने कर्मचारियों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों की जांच पूरी करने के लिए छह महीने की निश्चित समय सीमा तय कर दी है. मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के मामलों में तेजी से जांच और फैसला लाने के उद्देश्य से किया है. इसीलिए सरकार ने कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने केंद्रीय लोक सेवाएं (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील (नियम), 1965 में संशोधन किया है.

नए कानून के अनुसार जांच अथॉरिटी केंद्र सरकार को आरोपों की लिस्ट, दुर्व्यवहार के आरोप की कॉपी, इसके साथ ही गवाहों की लिस्ट के साथ-साथ पूरी जानकारी सौंपेगा. आपको यहाँ बता दें कि अभी तक इस तरह की जांच के लिए कोई समय नहीं तय की गयी थी.


5 से 10 साल लग जाते थे भ्रष्टाचार मामले में, कुछ केस में तो भ्रष्टाचारी मर जाता है पर फैसला नहीं आता

मोदी सरकार के नए कानून के मुताबिक अगर किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं तो उसकी जांच संबंधित विभाग को 6 महीने के अंदर ही करनी होगी.मोदी सरकार के इस नए कानून के बाद अब उन अधिकारियों की शामत आएगी, जो भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद लंबे समय तक मलाई खाते हुए तय वक़्त पर रिटायर भी हो जाते हैं और उनपर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती थी और मज़े से पेंशन भी लेते रहते थे लेकिन फैसला ही नहीं आता था.

इससे पहले भी केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों, बीमा कंपनियों और केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों को आदेश दिया था कि वे भ्रष्टाचार के वर्षो से लटके हुए पुराने मामलों की जांच में तेजी लाएं.


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