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मौलवी ने महिला और उसकी बेटी का बलात्कार किया, उसके बाद जो हुआ उसे देख आप दंग रह जाएंगे

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नई दिल्ली : देश में हालात कैसे खराब हो चुके हैं और देश का मीडिया व न्यायपालिका किस तरह से भ्रष्ट हो चुके हैं, इसका अंदाजा आपको इस बेहद हैरान कर देने वाली खबर को पढ़कर हो जाएगा. दरअसल पूरी साजिश हिन्दुओं के खिलाफ की जा रही है और एक ख़ास समुदाय के लोगों को बचाया जा रहा है. इसकी शुरुआत कांग्रेस ने “भगवा आतंकवाद” जुमले से की थी, जिसके लिए कर्नल पुरोहित व् असीमानंद जैसे बेगुनाहों को झूठे केसों में फंसाया गया था. अब कांग्रेस सत्ता से बाहर है, तब भी कांग्रेस का पालतू मीडिया अपने काम को पूरी शिद्दत से निभा रहा है.


नाम बदलकर एक समुदाय को बदनाम करने की साजिश

आये दिन ख़बरों में अपराधियों के नाम बदलकर दिखाए जाने की परम्परा सी शुरू हो गयी है. निर्भया काण्ड के सबसे जालिम दोषी मोहम्मद अफरोज को राजू कहकर ख़बरें छापी गयी थीं, कहीं कोई अब्दुल गिरफ्तार होता है तो ये मीडिया वाले उसे अनिल बता देते हैं.

हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस में स्विस कपल पर हमला करने वाले 5 दरिंदो को गिरफ्तार किया गया है, सभी विशेष समुदाय से है. मगर कुछ मीडिया वालो ने राहुल नाम बताया तो कुछ ने मुकुल, कुछ ने नाम बताने की जहमत ही नहीं उठायी. बाद में पता चला कि सभी 5 विशेष समुदाय वाले ही निकले. रामपुर में भी जब 15 जिहादियों ने 2 दलित लड़कियों के बलात्कार की कोशिश की तो मीडिया ने उनके नाम छुपाने की पूरी कोशिश की.

मौलानाओं को बाबा या स्वामी कहकर छापी जा रही हैं ख़बरें

इसी सिलसिले में एक और खबर सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रही है. दरअसल मुम्बई में कासिम शेख नाम के एक मौलाना को बलात्कार के आरोप में 7 साल की सजा सुनाई गयी है, मगर कई मीडिया चैनलों ने इस खबर के बगल में भगवा कपडे पहने स्वामी की तस्वीर चिपका दी.

इसी तरह अकमल अली नाम के एक अन्य मौलाना को जब पुलिस ने बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया तो कई मीडिया चैनलों ने उसके लिए स्वामी शब्द का प्रयोग किया. नीचे दिए ट्वीट में आप खुद इसकी सच्चाई देख सकते हैं.

इसी तरह नीचे दिए एक अन्य ट्वीट में आप साफ़ देख सकते हैं कि तांत्रिक कहते हुए एक बाबा की फोटो लगाकर खबर छापी गयी है, जिसमे बाबा को रुद्राक्ष की माला पहने दिखाया गया है. मगर जब आप पूरी खबर पढ़ेंगे तब पता चलेगा कि आरोपी हिन्दू है ही नहीं, बल्कि ख़ास समुदाय से सम्बन्ध रखता है.

सवाल ये उठने लगे हैं कि आखिर कोंग्रेसियों और कुछ मीडिया वालों को देश के बहुसंख्यक समुदाय से क्या समस्या हो गयी है? इसी तरह देश की न्यायपालिका में भी कुछ देश विरोधी तत्व घुस चुके हैं, इसका असर आप हाल ही में आये फैसलों में साफ़ देख सकते हैं.

उदाहरण के तौर पर दिवाली पर पटाखों का बैन, मगर सालभर पटाखे चलाने की छूट. सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान पर खड़े होने के अपने ही फैसले के खिलाफ फैसला. रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए मानवता दिखाना मगर कश्मीरी पंडितों के कत्लेआम की जांच व् सुनवाई से इंकार कर देना.

कुल मिलाकर देखा जाए तो अपराध कोई भी करे, लेकिन सजा हिन्दुओं को ही मिले? क्या ये ही है पत्रकारिता और न्यायपालिका?


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