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नोटबंदी पर आयी ये रिपोर्ट पढ़कर आपकी आँखें फटी रह जाएंगी, सामने आया मीडिया का कालासच !

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नई दिल्ली : सजा के ऐलान के साथ ही बाबा रहीम का मुद्दा दम तोड़ चुका, लिहाजा मीडिया अब एक बार फिर पीएम मोदी पर पिल पड़ा है. किसी भी मीडिया चैनल को खोल लीजिये, ज्यादातर आरबीआई की रिपोर्ट को लेकर नोटबंदी को फेल बताने में जुटे हुए हैं और पीएम मोदी पर निशाना साध रहे हैं. हालांकि नोटबंदी पर आयी ये रिपोर्ट पढ़कर आपको भी पता चल जाएगा कि नोटबंदी फेल हुआ है या पास और मीडिया आखिर झूठ क्यों बोल रहा है.

दरअसल नोटबंदी को लेकर औपचारिक आंकड़े पहली बार सामने आए हैं. रिजर्व बैंक ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में जानकारी दी है कि बंद किये गए नोटों में से लगभग 98.6 फीसदी बैंकों के पास वापस जमा करवा दिया गए. मीडिया इसी बात को उठाकर नोटबंदी को फेल बता रहा है. हालांकि उसका ध्यान उन 1.4 फीसदी नोटों की ओर नहीं जा रहा है, जो बैंक वापस लौटे ही नहीं.

1000 रुपये के 8 करोड़ 90 लाख नोट जमा नहीं हुए, यानी 8900 करोड़ रुपये. आठ हजार नौ सौ करोड़ रुपये कोई छोटी-मोटी रकम है क्या? ये तो अभी सिर्फ 1000 के नोटों का आंकड़ा है. अभी 500 के नोटों की जानकारी आना बाकी है, जिसके बाद बैंक ना आयी ये रकम इसकी दोगुनी से भी ज्यादा जा सकती है. अरबों रुपये वापस नहीं आये क्योंकि वो कालाधन थे, ये कोई छोटी-मोटी बात है क्या?

मीडिया का कहना है कि यदि ज्यादातर नोट वापस आ गए तो इसका मतलब हुआ कि देश में ज्यादा काला धन था ही नहीं. दरअसल इस झूठ को चलाने के पीछे का सच ये है कि नोटबंदी से जिन लोगों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है उनमें से एक मीडिया भी रही है. यहां हम आपको याद दिला दें कि नोटबंदी का विरोध करने वाले ज्यादातर वो लोग हैं जिन्हें या तो केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से दिक्कत है या वो बड़े लोग जिनके पास भारी मात्रा में अवैध कमाई पड़ी हुई थी और इस कदम से उन्हें परेशानियां उठानी पड़ीं. आइये अब आपको सरल शब्दों में बताते हैं नोटबंदी के फायदे और नुक्सान.

बैंकों में जमा पैसा पूरी तरह सफ़ेद नहीं !

1. नोटबंदी के बाद ज्यादातर नोटों का बैंकों में वापस आना नोटबंदी की नाकामी नहीं बल्कि एक सकारात्मक संकेत है. ये सोचना गलत है कि जो पैसा बैंकों में जमा हो गया वो सारा सफ़ेद है. नोटबंदी की भागम-भाग में कई लोगों ने अपनी काली कमाई भी चुपचाप बैंकों में जमा करवा दी. उन्हें लगा कि किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, जबकि आयकर विभाग की पैनी नज़र ऐसे लोगों पर थी. अब ऐसे लोगों से इस कमाई का जरिया पूछा जा रहा है और उस रकम पर उन्हें टैक्स देना होगा.

आयकर विभाग बारी-बारी से ऐसे धन्नासेठों को नोटिस जारी करके हिसाब-किताब के लिए बुला रहा है. ऐसे लोगों को जमा कराये कालेधन पर अब तक 30 से लेकर 80 फीसदी तक टैक्स भरना पड़ा है. रेगुलर इनकम वालों को 30 फीसदी, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत माफी पाने वालों से 50 फीसदी और धोखा देने की कोशिश करने वालों को 80 फीसदी तक टैक्स देना पड़ रहा है. बताया जा रहा है कि इस तरह लगभग 3 लाख करोड़ रुपये बाजार में आए हैं. ये वो रकम थी जो अब तक काले कुबेरों की तिजोरियों में बंद थी.

इनकम टैक्स के दायरे में आये लाखों लोग !

2. अगला फायदा ये है कि जो लोग कालेधन मामले में पकडे जा चुके हैं और जो अभी आगे पकडे जाएंगे, वो कोई छोटे-मोटे लोग नहीं हैं. एक बार आयकर विभाग के जाल में फंसने के बाद अब भविष्य में वो टैक्स चोरी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि सरकार के पास उनका पूरा हिसाब पहुंच चुका है. यदि ऐसे लोग अब आयकर रिटर्न फेल करने से बचने की कोशिश करते हैं तो आयकर विभाग उन्हें आसानी से धर लेगा.

नोटबंदी से पहले आयकर विभाग के पास ऐसे लोगों की कोई जानकारी थी ही नहीं. सरकार की ओर बताया गया है कि नोटबंदी के कारण 56 लाख नए करदाता जुड़े हैं. जरा सोचिये ये 56 लाख नए करदाता रातों-रात कहाँ से पैदा हो गए? दरअसल ये वही लोग हैं जिनकी कमाई तो करोड़ों अरबों में है लेकिन ये पहले टैक्स देते ही नहीं थे.


ऐसे ही लोगों के कारण ही टैक्स का पूरा बोझ ईमानदार कारोबारियों और मध्यमवर्गीय नौकरीपेशा लोगों पर आ जाता था. इसी तरह इनकम टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या में भी 25 फीसदी का इजाफा हुआ है, जबकि पहले ये संख्या 9 फीसदी से कम रहा करती थी.

पकड़ी गयीं लाखों फर्जी कंपनियां !

3. सबसे बड़ा फायदा जो हुआ है, वो है कि देश में 2 लाख फर्जी कंपनियां पकड़ी गईं हैं. इन कंपनियों के द्वारा ही भ्रष्ट लोगों का कालाधन इधर से उधर होता था. नोटबंदी के बिना इन्हे पकड़ना संभव नहीं था, क्योंकि कानूनों की कमियों के चलते ऐसी कंपनियां बच निकलती थीं. यदि सामान्य तरीके से इन्हे पकड़ने की कोशिश की भी जाती, तो भी उसमे कम से कम 8 से 10 साल का वक़्त लग जाता. नोटबंदी से वहीँ काम कुछ ही महीनों में हो गया.

पकड़ी गयी ऐसी जाली व् फर्जी कंपनियां दरअसल कोई कामधाम करती ही नहीं थीं, कई तो केवल कागजों पर ही बनीं थी. काले कुबेरों के ड्राइवर व् नौकरों के नाम पर ऐसी कंपनियां चला करती थी. बेचारे गरीब ड्राइवरों व् नौकरों को पता ही नहीं होता था कि वो किसी कागजी कंपनी के मालिक हैं और उनके नाम से रोज लाखों-करोड़ों का ट्रांजैक्शन हो रहा है. ज्यादातर अर्थशास्त्री इसे नोटबंदी की सबसे बड़ी कामयाबियों में से एक मान रहे हैं.

अर्थव्यवस्था में नकली नोटों में आयी भारी कमी !

4. नोटबंदी के कारण नकली नोटों के धंधे पूरी तरह से चौपट हो गए. हालांकि कभी-कभार नए नोटों के नकली नोट भी पकडे जा रहे हैं लेकिन पहले के मुकाबले इनकी संख्या काफी कम है. नोटबंदी से पहले तो देश में नकली नोटों की बाकायदा एक अलग अर्थव्यवस्था चलती थी, जबकि अब नए नोटों में नकली की पहचान बहुत आसान हो गई है. पश्चिम बंगाल का मालदा तो नकली नोटों की राजधानी की नाम से जाना जाता था, लेकिन अब सबके धंधे बंद हो गए हैं.

विकास दर और नकदी का अनुपात हुआ कम !

5. किसी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था की निशानी होता है कि उसकी विकास दर और नकदी का अनुपात बहुत ज्यादा न हो. नोटबंदी से पहले अर्थव्यवस्था में करंसी का कुल अनुपात 12.2 फीसदी था, जो नोटबंदी के बाद कम हो कर 8.8 फीसदी हो गया है. यह एक ऐसा लक्ष्य था जिसे नोटबंदी के जरिए बहुत कम समय में हासिल कर लिया गया.

बाहुबलियों की राजनीतिक दुकानें हुई बंद !

6. चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर कालाधन खपाया जाता था, शराब की बोतलें व् 500 के नोट बाँटने की ख़बरें आती थीं जबकि नोटबंदी के बाद ऐसी ख़बरें लगभग बंद हो गयीं. सूटकेसों व् अलमारियों में बंद नोट रद्दी हो गए तो बाटेंगे कैसे. इस कारण निष्पक्ष चुनाव होना शुरू हुए.

नोटबंदी के बाद देश के पूर्व प्रधानमंत्री और जाने-माने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि इससे विकास दर में 2 फीसदी की गिरावट आ जाएगी, यह बात भी पूरी तरह निराधार साबित हुई है. दरअसल दुनिया भर के कई बड़े अर्थशास्त्री नोटबंदी को आर्थिक समानता लाने वाले कदम के तौर पर देखते रहे हैं. उनकी राय में ये वो पहला कदम था जो आगे चलकर भारत जैसे बड़े देश में अमीरों और गरीबों की खाई को पाटने में मदद करेगा.

मगर मीडिया की चिल्ल-पौं हम और आप समझ सकते हैं. धंधा मंदा हो गया तो तकलीफ तो होनी ही है.


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