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पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या पर हुआ बेहद सनसनीखेज खुलासा, साजिश देख मोदी के भी उड़े होश !

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नई दिल्ली : बेंगलुरु में ‘वामपंथी झुकाव’ वाली एक पत्रकार की सर में तीन गोलियां मारकर हत्या कर दी गयी. चंद मिनटों में ही ये ख़बर आग की तरह फैली और पत्रकारिता के माफियाओं ने फ़ैसला सुना दिया कि कट्टर हिंदूवादी संगठनों ने हत्या की है, क्योंकि पत्रकार कट्टर हिंदूवाद की विरोधी थी. गुजरात चुनाव के प्रचार में लगे राहुल बाबा ने तो इसके लिए पीएम मोदी से जवाब तक तालाब कर लिया है. हालांकि ऐसे सनसनीखेज खुलासे सामने आ रहे हैं, जिसे देख देशभर के लोग हैरान रह गए हैं.

गौरी लंकेश के ट्वीट !

गौरी लंकेश के खुद के आख़िरी ट्वीट्स साफ़ इशारा करते हैं कि जिस भी संगठन से उनका वैचारिक प्रेम रहा है, उसके साथ उनके सम्बंध अच्छे नहीं चल रहे थे. उन्होंने ट्वीट करके कॉमरेड्ज़ को आपस में लड़ने की बजाय असली दुश्मन से लड़ने की नसीहत भी दी थी. शायद इसी साज़िश से ध्यान हटाने के लिए बड़े कॉमरेड्ज़ ने बिना वक़्त गंवाए हिंदूवादी संगठनों का शिगूफ़ा छोड़ दिया.

आधे घंटे में छप गए पोस्टर !

पुलिस जांच शुरू भी नहीं हुई, उससे पहले ही कॉमरेड्स ने मौत के आधे घंटे के अंदर-अंदर तय कर दिया कि हत्या हिंदूवादी संगठन ने की है. हत्या के आधे घंटे के अंदर-अंदर ही बैनर/पोस्टर छपवा कर ये कॉमरेड्स सड़कों पर उतर आये. एक सुर, एक ताल, एक लय में सोशल मीडिया के ज़रिए भी अपनी वैचारिक लड़ाई पर पर्दा डाल कर मामले का भगवाकरण करने में जुट गए.

सवाल ये है कि इतनी जल्द पोस्टर/बैनर कैसे छप गए? इतनी जल्दी कैसे ये तय कर लिया गया कि किसने ह्त्या की है? क्या ह्त्या से पहले ही ये बात तय कर ली गयी थी कि अपने रास्ते से हटाने के लिए पत्रकार की ह्त्या करके सारा इल्जाम हिंदूवादी संगठनों पर डाल देना है? इतने सारे लोग एक-साथ इतनी जल्दी सड़कों पर पोस्टरों के साथ उतर आये, ये एक गहरी साजिश की तरफ इशारा करता है.

पहले भी हो चुके हैं ऐसे अपराध !

हेमंत यादव, राजदेव रंजन, संजय पाठक, ब्रजेश कुमार जैसे पत्रकारों ने पहले भी जान गंवाई है- वैचारिक झंडाबिरदारी करते हुए नहीं, ख़बरों के पीछे भागते हुए. लेकिन अफ़सोस है कि उनके लिए ना तो राजनीतिक पार्टियों को शर्मिंदगी हुई और ना ही उनकी क़ौम के कथित ठेकेदार पत्रकारों को जो गौरी लंकेश की शव यात्रा में ट्विटर और फ़ेसबुक पर ही शामिल होकर लाइक्स और रीट्वीट्स कमाने की जुगत में लगे हैं.

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार, तो बीजेपी दोषी कैसे ?

कर्नाटक में सरकार तो सिद्धरमैया की है, लेकिन क़ानून व्यवस्था के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने की जगह हिंदूवादी संगठनों के नाम ठीकरा फोड़कर पीएम मोदी से जवाब तलब करके, सिद्धरमैया को इशारा दे दिया गया है कि आपका इस्तीफ़ा नहीं मांगेंगे, बशर्ते आप जांच कॉमरेड्ज़ की आपसी खींचतान की ओर ना ले जाएं.


कोंग्रेसी भ्रष्टाचार के खिलाफ खबर पर कर रही थीं काम !

खुद गौरी लंकेश ने जानकारी दी थी कि वो कर्नाटक के कांग्रेसी विधायक डीके शिवाकुमार के खिलाफ एक मामले में जांच कर रही हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि डीके शिवाकुमार वही कोंग्रेसी विधायक हैं, जिनके रिसॉर्ट में हाल ही में गुजरात के कांग्रेसी विधायक रुके थे. कालेधन के मामले में उन पर सीबीआई छापेमारी भी कर चुकी है. इसके अलावा कर्नाटक सरकार और मुख्यमंत्री सिद्धरमैया से जुड़े एक भ्रष्टाचार के मामले को भी गौरी लंकेश अपनी पत्रिका में छापने वाली थी.

अपने भाई से ही जताया था ख़तरा !

गौरी लंकेश का अपने भाई से भी विवाद था. मामला थाने तक जा चुका था. उन्होंने अपने भाई के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी कि उनके भाई ने रिवॉल्वर निकालकर उन्हें जान से मारने की धमकी दी थी. इसके बावजूद सीधे हिंदूवादी संगठनों को बदनाम करके ह्त्या के मामले का भगवाकरण करना एक साजिश की ओर इशारा करता है.

दूध की धुली नहीं थी पत्रकार !

झूठी ख़बरें छापने का आरोप उनपर लगते रहे हैं. बीजेपी के एक नेता की शिकायत पर उनके ख़िलाफ़ मानहानि के मामले में वो ज़मानत पर बाहर थी. 2008 में बीजेपी सांसद प्रह्लाद जोशी और उमेश धुसी ने उनके अखबार में छपे एक लेख को झूठ बताते हुए अदालत में उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा भी ठोक दिया था. अदालत में गौरी लंकेश अपनी रिपोर्ट को सही साबित नहीं कर पाईं और अदालत ने उन्हें 6 महीने की जेल और जुर्माने की सज़ा भी दी थी.


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