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नक्सलियों के खात्मे के लिए आ गए अजित डोभाल, भारतीय सेना करेगी नक्‍सलियों को नेस्‍तनाबूत !

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नई दिल्ली : छत्‍तीसगढ़ के सुकमा में कल हुए नक्सली हमले में 26 जवानों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. इस बड़ी घटना से जहाँ एक ओर सारा देश गुस्से में है, वहीँ पीएम मोदी ने खुद भी इस घटना को लेकर बेहद गंभीर रुख इख्तियार कर लिया है. नक्सली भी देश के ही नागरिक हैं, ये सोचकर नक्सलियों के खात्मे के लिए सेना को नहीं लगाया गया था लेकिन अब खबर आ रही है कि सेना को ये जिम्मेदारी सौंपने पर विचार किया जा रहा है.

पीओके की तरह नक्सलियों पर सर्जिकल स्ट्राइक ?

खबर है कि पीएम मोदी ने इस हमले को लेकर राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से भी बात की है और सूत्रों के मुताबिक़ नक्‍सल प्रभावित इलाकों में सेना की तैनाती पर विचार किया जा रहा है. पीएम मोदी खुद इस पूरे मामले पर नज़र बनाये हुए हैं. सूत्रों के मुताबिक़ नक्सलियों के ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक करने के बारे में भी योजना बनायी जा रहा है.

दरअसल विकास के जरिये से नक्सलियों को आत्मसमर्पण करवाने और मुख्य धारा से जोड़ने की सरकार की कोशिश पूरी तरह से सफल नहीं हो रही है, जिसके बाद अब नक्सलियों को सबक सिखाने की रणनीति बनाई जा रही है. जानकारों के मुताबिक़ सीआरपीएफ के जवानों पर हुए हमले के बाद अब नक्सलियों के गढ़ यानी बस्तर में सेना का कैंप करना जरूरी हो गया है.

सेना के जवान करेंगे नक्‍सलियों को नेस्‍तनाबूत !

सरकार का उद्देशय था कि सड़कों के द्वारा गाँवों को शहरों से जोड़ कर विकास कार्यों को गाँव वालों तक ले जाया जाए, जिससे नक्सलियों का प्रभाव कम हो और लोग मुख्य धारा से जुड़ जाएँ, लेकिन नक्सली सरकार की विकास योजनाओं को देख बुरी तरह से बौखलायें हुए हैं और अपनी इसी बौखलाहट में उन्होंने खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है.

इतना बड़ा हमला करके नक्सलियों ने खुद अपने ही लिए बड़ी समस्या खड़ी कर ली है. यदि बिना उकसावे के मोदी सरकार इन पर कार्रवाई करती तो देश के कई वामपंथी संगठन इनके पक्ष में खड़े हो जाते लेकिन इस हमले के बाद तो मानो सरकार को कार्रवाई करने की हरी झंडी ही मिल गयी है. ऐसे में अब सेना द्वारा नक्सलियों का जड़ से सफाया किये जाने की योजना पर काम शुरू किया जा रहा है.

माना जा रहा है कि इस हमले के बाद कम से कम एक बार नक्‍सलियों के खिलाफ बस्‍तर में सेना का ऑपरेशन बहुत जरुरी है, ताकि उन्‍हें भी इस बात का एहसास हो सके कि यदि वो किसी बड़े हमले को अंजाम देते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया हमले से कहीं बड़े ऑपरेशन से चुकानी पड़ सकती है.

आसान नहीं नक्सलियों पर ऑपरेशन !

वहीँ जानकारों का कहना है कि सेना के कैंप से नक्‍सलियों पर दबाव बढ़ेगा. दरअसल नक्सलियों से लड़ना इतना आसान नहीं, जितना कि ये दूर से दिखता है. नक्सली आम नागरिकों के बीच घुले-मिले रहते हैं, इन्हे ग्रामीण व् आदिवासियों का समर्थन भी प्राप्त होता है, ऐसे में आम नागरिकों के बीच मौजूद नक्‍सली को पहचानना अपने आप में एक चुनौती से कम नहीं होता.

नक्सली गांव में रोजमर्रा के अपने कामों में व्‍यस्‍त रहते हैं और हमले के दौरान फौरन अपने छुपाये हुए हथियार उठा लेते हैं. हमले से पहले और बाद में इन लोगों की पहचान काफी मुश्किल होती है. ग्रामीणों व् आदिवासियों के समर्थन के कारण इनका खुफिया तंत्र सुरक्षाबलों के खुफिया नेटवर्क से ज्‍यादा तेज और मजबूत होता है, इसी के चलते सुरक्षाबलों को यहां पर नक्‍सलियों के खिलाफ ऑपरेशन में दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है.

लेकिन सेना इस तरह के ऑपरेशन में सक्षम होती है. सेना के जवानों की ट्रेनिंग में ऐसे हालात से निपटना और आम लोगों के बीच छुपे हुए दुश्मनों को ढूंढ निकालना सिखाया जाता है. ऐसे में सेना की तैनाती से नक्सलियों का पूर्ण रूप से सफाया होना तय माना जा रहा है.

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