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भारत को दुनिया की महाशक्ति बनाने के लिए बेकरार ट्रम्प, मोदी को देंगे ‘हाइपरलूप’ का ब्रह्मास्त्र

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नई दिल्ली : प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दोस्ती कितनी गहरी है इस बात का अंदाजा इस बात से लगा लीजिये कि ट्रम्प अब भारत को एक ऐसा तोहफा देने जा रहे हैं, जिसके बारे में कभी कल्पना भी नहीं की गई थी. इस तोहफे का नाम है “हाईपरलूप“, जो एकदम नयी-नयी ईजाद हुई ऐसी ट्रैन है जो बुलेट ट्रैन और हवाई जहाज से भी तेज चलती है.

हवाई जहाज से तेज और सस्ती यात्रा

सोचिये जरा, कैसा रहेगा यदि आप केवल 1 घंटे में दिल्ली से मुंबई पहुंच जाएँ, क्या ये किसी चमत्कार से कम नहीं होगा? खबर आ रही है कि अमेरिकी कंपनी के कुछ अधिकारी दिल्ली आ चुके हैं और भारत के परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से इस बारे में बातचीत कर चुके हैं.

हाइपरलूप ईजाद करने वाली कंपनी का नाम हाइपरलूप ट्रांसपोर्टेशन टेक्नोलॉजीज है और ये अमेरिका के लॉस ऐंजिलिस में है. हाइपरलूप ट्रांसपोर्टेशन टेक्नोलॉजीज के को-फाउंडर बिबॉप ग्रेस्टा के मुताबिक़ इस तकनीकि के जरिए आप हवाई जहाज से तेज और सस्ती यात्रा कर सकते हैं.

उनके मुताबिक़ नितिन गडकरी को हाइपरलूप का प्रस्ताव काफी अच्छा लगा है. ग्रसेटा के मुताबिक़ भारत सरकार से इस प्रोजेक्ट के लिए जमीन मिलने के 38 महीने के अंदर-अंदर ही भारत में हाइपरलूप ट्रेन तैयार कर दी जाएगी. ग्रेस्टा के मुताबिक़ भारत में मोदी सरकार तेज रफ़्तार ट्रेनों के बारे में विचार कर रही है और उनके इस प्रोजेक्ट के जरिये से भारत दुनिया के बाकी देशों से काफी आगे निकल जाएगा.

क्या है हाइपरलूप

हाइपरलूप एक प्रकार की ट्रैन है लेकिन इसकी रफ़्तार इतनी अधिक होती है कि ये बुलेट ट्रेनों को काफी पीछे छोड़ देती है और इसकी कीमत भी बुलेट ट्रेनों की तुलना में काफी कम आती है. बुलेट ट्रेन के लिए 1 किलोमीटर का ट्रैक बनाने में 100 मिलियन डॉलर यानी करीब 674 करोड़ रुपये लगता है, लेकिन हाइपरलूप ट्रेन के 1 किलोमीटर के ट्रैक को बनाने में केवल 40 मिलियन डॉलर यानी करीब 269 करोड़ रुपये का ही खर्चा आता है जोकि बुलेट ट्रैन के मुकाबले में एक तिहाई है.

एक हवारहित ट्यूब में चुम्बकीय क्षेत्र की सहायता से ये ट्रैन उड़ती हुई जाती है. इस ट्रैन में ना तो कोई पटरी होती है ना ही कोई पहिये और जिस ट्यूब में ये उड़ती है उसमे हवा भी नहीं होती इसलिए घर्षण भी नहीं होता. हवा केवल ट्रैन के अंदर होती है ताकि यात्रियों को कोई कष्ट ना हो.

ये तकनीक इतनी नयी है कि अभी दुनिया के किसी भी देश में ये नहीं आयी है. इसे सबसे पहले अमेरिका और भारत में चलाया जाएगा. इस तकनीक के आने से भारत चीन और जापान जैसे देशों को भी रफ़्तार के मामले में काफी पीछे छोड़ देगा.

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