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पकड़ा गया गोरखपुर हादसे का मास्टर माइंड, नाम और कारनामे जानकार बुरी तरह चौंक जाएंगे आप

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नई दिल्ली : गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुए हादसे के बाद अब तेजी से जांच की जा रही है. सीएम योगी ने दोषियों के खिलाफ अब तक का सबसे कठोर एक्शन लेने का वादा भी किया है. शुरूआती जांच के बाद अब हादसे के लिए एक ऐसा नाम सामने आ रहा है, जिसे देख आप भी हैरान रह जाएंगे.

घर बैठे मेडिकल कॉलेज को इशारों पर नचाती थीं प्रिंसिपल की पत्नी !

दरअसल जांच की जा रही है कि आखिर इतना बड़ा प्रशासनिक स्टॉफ होने के बावजूद मेडिकल कॉलेज से इतनी बड़ी चूक आखिर हुई तो हुई कैसे. खुलासा हुआ है कि मेडिकल कॉलेज में फैले भ्रष्टाचार की चाबी तो दरअसल प्रिंसिपल डॉक्टर राजीव मिश्रा की पत्नी डॉक्टर पूर्णिमा शुक्ला के हाथों में रहती है. पूरे भ्रष्टाचार का संचालन मैडम के हाथों से किया जा रहा था.

मेडिकल कॉलेज के कुछ चिकित्सकों और अन्य स्टाफ ने बताया है कि मेडिकल कॉलेज का प्रशासनिक स्टॉफ तो बेचारा पूरा वक़्त मैडम का हुक्म बजाने में ही व्यस्त रहता है, वरना नौकरी से सीधे छुट्टी. मैडम घर बैठे-बैठे फ़ोन से ही तमाम आदेश जारी कर देती हैं. कॉलेज का पूरा स्टाफ प्रिंसिपल राजीव मिश्रा की पत्नी से परेशान रहता था.

अब प्रिंसिपल साहब ने अपनी पत्नी को इतनी पावर क्यों दी हुई है, ये तो वही जानें. वैसे एक खुलासा ये भी हुआ है कि राजीव मिश्रा की प्रिंसिपल पद पर पोस्टिंग भी सपा सरकार में अखिलेश का बेहद करीबी होने के कारण ही हुई थी. राजनीतिक कनेक्शन होने के चलते खौफ ऐसा कि मजाल है स्टाफ का कोई बन्दा चूं तक कर जाए.

जब सईंया भये कोतवाल तो डर कैसा

अब वो कहावत है ना कि जब सईंया भये कोतवाल तो डर कैसा, लिहाजा प्रिंसिपल साहब की पत्नी का वचन ही स्टाफ के लिए आदेश होता था. लूट का आलम कुछ ऐसा था कि सरकारी पैसों से करोड़ों की लूट तो हर साल होती ही थी, साथ में चिन्दी चोरो की तरह मैडम ने कॉलेज कैंपस में मूंगफली बेचने वालों तक से महीने के पैसे बांध रखे हैं. इससे पहले नॉन पीजी रेजीडेंट से अवैध वसूली के आरोप भी सामने आ चुके हैं.

सरकारी पैसों की लूट का एक और उदाहरण अब देखिये. गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में लिक्विड आक्सीजन की उपलब्धता काफी आसान है. सिलेंडर के मुकाबले ये आक्सीजन काफी सस्ती भी होती है. खुलासा हो रहा है कि सबसे पहले तो लिक्विड आक्सीजन सप्लाई के लिए टेंडर देने में कमीशनखोरी होती है. जो ज्यादा कमीशन देगा, उसको टेंडर मिलेगा.


कमीशन के चक्कर में महंगी ऑक्सीज़न खरीदी जाती थी !

इसके अलावा 35 फ़ीसदी महंगी सिलेंडर आक्सीजन की सप्लाई के लिए पुष्पा फर्म को टेंडर दे दिए गए. इसी पुष्पा फर्म ने 66 लाख रुपये बकाया होने के बाद सप्लाई रोक दी थी. हालांकि बताया जा रहा है कि बच्चों की जान आक्सीजन की कमी के कारण नहीं गयी लेकिन मीडिया ने इसे आक्सीजन की कमी बताया और इसी चक्कर में बरसों से चल रहे गोलमाल का पर्दाफ़ाश हो गया.

खुलासा ये भी हुआ है कि लिक्विड आक्सीजन की कीमत सिलेंडर वाली आक्सीजन से करीब 35 फीसद कम है, इसके बावजूद कमीशन के चक्कर में प्रतिदिन तकरीबन सवा सौ सिलेंडर मंगवाए जाते रहे. हर सिलेंडर पर कट बंधा होता है. हालांकि पहले तकरीबन 60 सिलिंडर ही प्रतिदिन मंगवाए जाते थे, लेकिन हाल के महीनों में यह संख्या दोगुनी कर दी गई थी.

सरकारी फंड मिलने से पहले ही अकाउंट में पर्याप्त पैसे थे !

अगला खुलासा जो सामने आया है, वो तो और भी ज्यादा हैरान करने वाला है. मेडिकल कॉलेज को ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली पुष्पा सेल्स को 68.65 लाख रुपये का भुगतान करना था. कॉलेज के खाते में पहले से 1.86 करोड़ रुपये थे, इसके बावजूद प्रिंसिपल ने पेमेंट नहीं किया और 4 अगस्त को पत्र भेजकर शासन से पैसे की मांग की. उसके ठीक अगले ही दिन बीआरडी मेडिकल कॉलेज के अकाउंट में 2 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर दिए गए, जिससे अकाउंट में अब 3.86 करोड़ रुपये हो गए थे लेकिन प्रिंसिपल साहब ने कमीशन के इन्तजार में पेमेंट नहीं किया.

बताया जा रहा है कि सप्लायर को पैसा न देने के लिए निर्देश लखनऊ से आए थे. सवाल उठता है कि आखिर लखनऊ में किसके कहने पर सप्लायर का पैसा रोका गया था और क्यों? ये सवाल समाजवादी पार्टी को बड़ा परेशान कर रहा है. साफ़ है कि मामले में खुद को फंसता देख आरोपी अब अपने माईबाप के नाम कबूल करेंगे. जैसे कड़े तेवर सीएम योगी अपना रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि सपा के कई नेता जल्द ही सलाखों के पीछे होंगे.

11 अगस्त को बच्चों की मौत के बाद जब मामला मीडिया में पहुंच गया, तब जा कर सप्लायर को भुगतान किया गया. अस्पताल में ऑक्सीज़न नहीं है तो ऐसे में प्रिंसिपल को बिगड़े हालात को काबू में करने के लिए जी-जान लगा देना चाहिए था, लेकिन बच्चों की मौत होने पर वो तो सिस्टम को बेबस छोड़कर पतली गली से भाग निकले.


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