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नक्सलियों के बारे में डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे के विचार जानकार हैरत से आपकी आँखें ही फटी रह जाएंगी

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नई दिल्ली : जहाँ एक ओर नक्सलियों के हमलों में जवानों की जान जा रही हैं, जहाँ नक्सलियों के खिलाफ सारे देश में गुस्से की लहर है, जहाँ देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल खुद नक्सलियों के खात्मे की कमान अपने हाथ में लिए हुए हैं. वहीँ देश तो दूर छत्तीसगढ़ की ही एक जेल की डिप्टी जेलर जैसे बड़े पद विराजमान वर्षा डोंगरे, सीआरपीएफ के जवानों की तुलना खुनी खेल रहे नक्सलियों से कर रही हैं.


शहीद हुए जवानों की चिता की राख अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि उन्ही शहीदों का अपमान किया जाना शुरू हो गया. दरअसल पीएम मोदी ने सीआरपीएफ को खुली छूट दे दी, जिसके बाद बड़े पैमाने पर जवानों ने नक्सलियों और माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन चलना शुरू कर दिया और कई माओवादियों को ढेर कर दिया व् कइयों ने जान बचाने के डर से खुद ही आत्मसमर्पण कर दिया.

नक्सलियों का खात्मा होते देख शहरों में उच्च पदों पर बैठे सफेदपोश नक्सलियों ने धीरे-धीरे उनके बचाव में सामने आना शुरू कर दिया है. ऐसी ही एक अधिकारी हैं ये डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे, जिन्हे नक्सलियों को मरता देख बेहद पीड़ा होनी शुरू हो गयी है. ये बात हम नहीं कह रहे हैं बल्कि खुद इन्होने ही अपनी एक फेसबुक पोस्ट में कहा है.

अब ज़रा कल्पना कीजिये कि यदि इनकी जेल में कोई नक्सली कैदी के रूप में जाता होगा तो उसके प्रति इनका रुख कितना प्रेम भरा होता होगा? क्या उसे एक मामूली कैदी की तरह नहीं बल्कि एक वीआईपी की तरह से विशेष सुविधाएं ऑफर नहीं की जाती होंगी?

रायपुर जेल की डिप्टी जेलर वर्षा डोंगरे अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखती हैं कि इनके मुताबिक़ नक्सली भी भारतीय हैं, इसलिए उनके मरने पर इन्हे बेहद दुःख होता है. वैसे यदि इसी तरह से सोचा जाए तो देश में पलने वाले कई आतंकी भी भारतीय ही होते हैं, स्त्रियों का बलात्कार करने वाले व् लोगों की ह्त्या करने वाले अपराधी भी भारतीय ही तो होते हैं तो क्या उन्हें सजा ना दी जाए?

इनके मुताबिक़ सरकार आदिवासियों को उनके जल, जंगल,ज़मीन से बेदखल करने के लिए गांव के गांव जलवा देती है. इनके मुताबिक़ सरकार पूँजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना चाहती है. इनके मुताबिक़ सीआरपीएफ के जवान आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार करते हैं. केवल इतना ही नहीं बल्कि इन्होने तो एक नया ही शिगूफा छोड़ते हुए ये तक कह दिया कि आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं, इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनके स्तन को निचोड़कर दूध निकालकर देखा जाता है.

अपनी बेहूदा सोच का प्रदर्शन करते हुए ये आगे कहती हैं कि सरकार की विकास योजनाएं दरअसल आदिवासियों को जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति हैं. इन्होने आगे कहा कि, “आखिर ये सबकुछ क्यों हो रहा है. नक्सलवाद ख़त्म करने के लिए… लगता नहीं. सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं, जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है. आदिवासी जल-जंगल-ज़मीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है.


वो नक्सलवाद का अंत तो चाहते हैं लेकिन जिस तरह से देश के रक्षक ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत उतार रहे हैं, उनके घर जला रहे हैं, उन्हे फर्जी केसों में चारदीवारी में सड़ने भेजा जा रहा है.तो आखिर वो न्याय प्राप्ति के लिए कहां जायें. ये सब मैं नहीं कह रही सीबीआई रिपोर्ट कहती है, सुप्रीम कोर्ट कहती है, जमीनी हकीकत कहती है.जो भी आदिवासियों की समस्या समाधान का प्रयत्न करने की कोशिश करते हैं, चाहे वह मानव अधिकार कार्यकर्ता हों, चाहे पत्रकार, उन्हें फर्जी नक्सली केसों में जेल में ठूंस दिया जाता है.

अगर आदिवासी क्षेत्रों में सबकुछ ठीक हो रहा है तो सरकार इतना डरती क्यों है. ऐसा क्या कारण है कि वहां किसी को भी सच्चाई जानने के लिए जाने नहीं दिया जाता.मैंने स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुड़िया माड़िया आदिवासी बच्चियों को देखा था, जिनको थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताड़ित किया गया था.उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करेंट लगाया गया था, जिसके निशान मैंने स्वयं देखे. मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किस लिए.

मैंने डाक्टर से उचित उपचार व आवश्यक कार्यवाही के लिए कहा.राज्य में 5 वीं अनुसूची लागू होनी चाहिए. आदिवासियों का विकास आदिवासियों के हिसाब से होना चाहिए. उन पर जबरदस्ती विकास ना थोपा जाये. आदिवासी प्रकृति के संरक्षक हैं. हमें भी प्रकृति का संरक्षक बनना चाहिए ना कि संहारक… पूँजीपतियों के दलालों की दोगली नीति को समझें …किसान जवान सब भाई-भाई हैं. अतः एक दूसरे को मारकर न ही शांति स्थापित होगी और ना ही विकास होगा. संविधान में न्याय सबके लिए है, इसलिए न्याय सबके साथ हो.अब भी समय है, सच्चाई को समझे नहीं तो शतरंज की मोहरों की भांति इस्तेमाल कर पूंजीपतियों के दलाल इस देश से इन्सानियत ही खत्म कर देंगे. ना हम अन्याय करेंगे और ना सहेंगे.”

जेलर साहिबा की पोस्ट सोशल मीडिया में वायरल हो गयी और लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. विवाद बढ़ता देख जेलर साहिबा ने तुरंत अपनी पोस्ट डिलीट कर दी क्योंकि देश में नक्सलियों को बचाने के लिए बहस छेड़ने के लिए इतना काफी था. इन्हे पता था कि ऐसा करते ही देश के मीडिया में नक्सलियों पर बहस शुरू हो जायेगी और पैनल में कई अन्य सफेदपोश नक्सली आ कर नक्सलियों को मासूम बताना शुरू करके सरकार पर नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई बंद करने के लिए दबाव डालना शुरू कर देंगे.

नक्सलियों को बेहद मासूम बताने और सुरक्षाबलों को क्रूर साबित करने वाली सोशल मीडिया पर इनकी पोस्ट वायरल होने के बाद देशभर में इनके खिलाफ गुस्सा थोड़ा ज्यादा ही बढ़ गया, जिसका शायद इन्हे अनुमान भी नहीं था. छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने तत्काल प्रभाव से इन्हे निलंबित कर दिया.

छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिरीक्षक ( जेल ) श्री गिरिधारी नायक के मुताबिक़ ये विचारधारा बहुत ही खतरनाक है और डिप्टी जेलर वर्षा के खिलाफ पहले भी कई शिकायतें मिल चुकी हैं. इनके खिलाफ अब विभागीय कार्यवाही की जायेगी. छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री रामसेवक पैकरा ने बताया कि डिप्टी जेलर साहिबा की नक्सली विचारधारा की जांच की जा रही है और साथ ही उनके नक्सलियों से क्या सम्बन्ध हैं या रह चुके हैं, इसकी जांच भी की जा रही है.

हाथों में बंदूकें थामे, कत्लेआम करते और देश से आजादी की मांग करते ये कॉमरेड इतने खतरनाक नहीं हैं, जितने कि वो जो हाथों में कलम पकड़ कर इनकी मदद करते हैं. वो जो उच्च पदों पर बैठकर इन्हे बाहर से आर्थिक सहायता करते हैं. वो जो किसी भी कार्रवाई के वक़्त सामने आ कर सरकार का विरोध करते हैं. ऐसे सफेदपोश नक्सलियों का पर्दाफ़ाश होना बेहद जरुरी हो गया है.


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