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पूर्व विदेश सचिव ने कांग्रेस और पाकिस्तान के बीच हुई ऐसी डील का किया खुलासा, सन्न रह गया देश !

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नई दिल्ली : कुछ ही महीने पहले विकीलीक्स ने एक सनसनीखेज दस्तावेज का खुलासा किया था, जिसमें पता चला कि यूपीए सरकार ने सियाचिन ग्लेशियर को पाकिस्तान को देने फैसला किया था. ये एक ऐसा सनसनीखेज खुलासा था, जिसने पूरे देश को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था. हालांकि भारत में ये मामला बड़ी सफाई से मीडिया ने दबा लिया था, इसीलिए इस बात की संभावना कम ही है कि आपको इसके बारे में पता चला हो.

आइये अब आपको हम इस असलियत से रूबरू कराते हैं. विकीलीक्स के इस खुलासे के बाद कांग्रेस ने आरोपों से इनकार कर दिया था और कहा था कि विकीलीक्स कांग्रेस पार्टी को बदनाम करने के लिए झूठी ख़बरें फैला रहा है. लेकिन आज उसी व्यक्ति ने कांग्रेस के दोहरे चेहरे का पर्दाफाश कर दिया है, जिसके सामने भारत और पाकिस्तान के बीच ये समझौता होने जा रहा था.

कांग्रेस सियाचिन को पाकिस्तान को देना चाहती थी !

इस व्यक्ति का नाम है श्याम सरन, जो 2006 तक भारत के विदेश सचिव थे. इन्होने अपनी आने वाली किताब “How India Sees the World” में इस बात का खुलासा किया है कि कांग्रेस सरकार के आदेश पर उन्होंने और उनके पाकिस्तानी समकक्ष रियाज मोहम्मद खान के बीच समझौता हुआ था कि भारत सियाचिन ग्लेशियर से अपने जवानों को हटाएगा और सियाचिन ग्लेशियर को पाकिस्तान को दे देगा.

लेकिन तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन ने इस सौदे को होने से रोक दिया और भारत को कांग्रेस के अयोग्य और बेवकूफी भरे फैसले से बचा लिया. अपनी किताब में सरन ने लिखा है कि मनमोहन सिंह सियाचिन ग्लेशियर को सौंप कर पाकिस्तान के साथ सौदा करना चाहते थे.

भारतीय सेना से ली गयी थी रजामंदी !

सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात जो उन्होंने अपनी किताब में लिखी वो ये है कि इस सौदे को भारतीय सेना ने भी अपनी सहमति दे दी थी. इस सौदे के तहत दोनों देशों की सेनाओं की वर्तमान स्थिति, भारतीय सेना को किस जगह से और किस तरह से हटाया जाएगा जैसे कई अन्य अहम् बातों की भी चर्चा की गयी. यह सब मुख्य समझौते में एक अनुबंध में दर्ज किया गया.

उन्होंने लिखा कि, “दस्तावेज़ को और ज्यादा मजबूत बनाने के लिए हमने जोर दिया कि दोनों समझौते और अनुबंध पर दोनों देशों की ओर से बाकायदा हस्ताक्षर किए जाएंगे और मुख्य समझौता स्पष्ट रूप से ये घोषित करेगा कि अनुबंध की भी उतनी ही कानूनी वैधता होगी, जितनी की समझौते की है. इस बात पर पाकिस्तानी पक्ष सहमत भी हो गया.”

“मैंने रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अफसरों और मंत्री स्तर पर भी कई बार परामर्श किया.” उन्होंने दावा किया है कि तत्कालीन सेना प्रमुख जे जे सिंह और सभी खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों को भी मीटिंग में शामिल किया गया था. सौदे के लिए सेना की मंजूरी ली गयी थी और सौदे की जटिल तकनीकी जानकारियों को मिलिट्री ऑपरेशन्स के डायरेक्टर जनरल द्वारा तैयार किया गया था.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन की वजह से समझौता हुआ रद्द !

लेकिन सीसीएस की बैठक के दौरान एनएसए प्रमुख एमके नारायणन ने सौदे के बारे में गंभीर चिंताओं को उठाते हुए कहा कि इस सौदे से तो देश की राष्ट्रीय सुरक्षा ही खतरे में पड़ जायेगी.

“रक्षा सचिव स्तरीय वार्ता की पूर्व संध्या को आयोजित सीसीएस की बैठक में एनएसए प्रमुख एमके नारायणन भड़क गए और बोले कि पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता है और इस तरह की किसी भी पहल का राजनीतिक और सार्वजनिक विरोध होगा. ऐसा सौदा करने से पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ सटे उत्तरी क्षेत्र में भारत की सैन्य स्थिति कमजोर पड़ जायेगी.”


एनएसए की चेतावनी के बाद आर्मी चीफ को बात आयी समझ !

ये सब सुनकर जनरल सिंह, जिन्होंने पहले कांग्रेस के इस सौदे को अपनी रजामंदी दी थी, अब नारायणन के पक्ष में हो गए और सौदे को गलत कहने लगे. सरन ने अपनी किताब में खुलासा किया कि एनएसए प्रमुख एमके नारायणन ने जब राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे का मुद्दा उठाया, उसके बाद जाकर आर्मी चीफ ने माना कि सियाचिन समझौता सुरक्षित नहीं था और इससे भारत गंभीर खतरे में आ जाएगा.

इस बैठक में एनएसए प्रमुख के सामने अपनी इज्जत बचाने की खातिर गृह मंत्री शिवराज पाटिल और रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी भी चुप रहे, क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि इस तरह के मूर्खतापूर्ण समझौते को अपना समर्थन देकर वो अपनी मिटटी पलीद करवाएं. मनमोहन सिंह इस समझौते को करने के लिए मरे जा रहे थे मगर उन्होंने भी उस वक़्त मौन व्रत धारण कर लिया जब एनएसए प्रमुख ने इस समझौते को बकवास कहते हुए इसे रिजेक्ट कर दिया.

प्रणब मुखर्जी भी थे कांग्रेस के पक्ष में !

बैठक में नारायणन ने यह भी कहा कि भारत-पाक सीमा वार्ता के दौरान सियाचिन कभी भी एजेंडा बनना ही नहीं चाहिए. इसके बाद प्रणब मुखर्जी खुद सरन के समर्थन में खड़े हो गए और बोले कि राजीव गांधी ने खुद भारत-पाक सीमा वार्ता में सियाचिन को शामिल करने के लिए सहमति जताई थी.

ये घटनाएं स्पष्ट रूप से बताती हैं कि कैसे कांग्रेस सरकार सियाचिन ग्लेशियर को पाकिस्तान को देने के लिए तैयार थी, जिससे पूरे जम्मू कश्मीर की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती. सियाचिन ग्लेशियर सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है, जो भारत को पाकिस्तान और चीन दोनों से प्राकृतिक संरक्षण प्रदान करता है.

कारगिल में भारतीय जवानों ने बचाया था सियाचिन !

कारगिल युद्ध के दौरान जब पाकिस्तान ने सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा कर लिया था, तब सियाचिन ग्लेशियर वापस लाने के लिए 500 से अधिक जवानों ने अपना बलिदान दिया था. यहां तक ​​कि 1984 में ऑपरेशन मेघदूत के दौरान भी 890 से ज्यादा सैनिकों ने सियाचिन ग्लेशियर की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान किया था.

पहले नेहरू ने एक गलती की जब वो जम्मू-कश्मीर का मुद्दा आपस में सुलझाने की जगह, संयुक्त राष्ट्र पहुंच गए और दूसरी गलती सोनिया गांधी के इशारों पर चलने वाली कांग्रेस सरकार सियाचिन को पाकिस्तान को उपहार में देकर करने जा रही थी, वो तो भला हो एनएसए चीफ नारायणन का, जिहोने इसे रोक दिया.

वो पाकिस्तान, जिसने हमेशा भारत की पीठ पर छुरा भोंका है, उसपर भरोसा कांग्रेस ने आखिर किया कैसे? बॉर्डर पर सारी सुरक्षा लगाने और चौबीसों घंटे नज़र रखने के बाद भी पाकिस्तान से सैकड़ों आतंकी भारत में घुसपैठ कर जाते हैं, तो ज़रा सोचिये क्या होता अगर इस समझौते के तहत भारतीय सेना सियाचिन ग्लेशियर से हट जाती?

बड़े शर्म की बात है कि जिस सरकार को जनता ने देश की रक्षा करने के लिए चुना था, वो खुद ही दुश्मन को भारत में घुसने का रास्ता देने जा रही थी. इसे विश्वासघात नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे?


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