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गुस्से में आये सेना के जवानों का माथा ठनका, कर दिया बड़ा कांड,एक ही दिन में फूल बरसाने लगे पत्थरबाज !

kashmir-protests

कश्मीर : पिछले कुछ दिनों में कश्मीर से एक के बाद एक कई वीडियो वायरल हो रहे हैं. बडगाम में कुछ कश्मीरी युवकों द्वारा सीआरपीएफ के जवानों को पीटे जाने के वीडियो के बाद कल जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया जिसमें सेना की जीप के बोनट पर एक पत्थरबाज को बांधकर ले जाया जा रहा है.

पत्थरबाज के हमदर्द बने डिज़ाइनर पत्रकार !

इस वीडियो से जुडी कई अन्य बातें अब सामने आना शुरू हो गयी है. दरअसल जो व्यक्ति जीप के आगे बंधा हुआ नज़र आ रहा है, वो 26 साल का फारूक अहमद धर है. कुछ डिजाइनर पत्रकारों ने जैसे ही जीप वाला वीडियो देखा, फ़ौरन कश्मीर पहुंच गए पत्थरबाजों के दुःख-दर्द बांटने. बहरहाल “इंडियन एक्सप्रेस” से बात करते हुए फारूक ने खुद को निर्दोष बताया. उसके मुताबिक़ उसने कभी पत्थर फेंके ही नहीं.

उसने कहा कि वो पत्थरबाजी नहीं बल्कि कश्मीर में कुछ छोटे-मोटे काम करता है. फारूक के मुताबिक़ उस दिन वो अपने एक रिश्तेदार की अंतिम यात्रा में शामिल होने जा रहा था. रास्ते में विरोध प्रदर्शन होते देख वो वहां पर रुक गया. जिसके बाद जवानों ने उसे पकड़कर जीप के आगे बाँध दिया. ऐसे ही जीप के आगे बंधा-बंधा नौ गांवों से होता हुआ वो स्थानीय सीआरपीएफ कैंप में पहुंचा, जहां उसे जीप से खोला गया और कैंप में बिठाया गया.

फारूक ने आगे बताया कि इस दौरान सीआरपीएफ जवान गाड़ी से लाऊड स्पीकर के जरिये आवाज लगा रहे थे कि आओ और अब अपने ही आदमी पर पत्थर चलाओ. फारूक के मुताबिक़ इस घटना के बाद से वो और उसकी माँ काफी डरे हुए हैं और वो किसी के खिलाफ शिकायत भी दर्ज नहीं करवाना चाहते. फारूक ने खुद को गरीब आदमी बताते हुए कहा कि वो कहां शिकायत करेगा. वो कुछ नहीं करना चाहता.

विवादित लेकिन प्रभावी था तरीका !

वहीँ इस वीडियो के बारे में सेना की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान तो नहीं आया है लेकिन सेना से जुड़े कुछ सूत्रों के मुताबिक़ 9 अप्रैल को बडगाम में लगभग 500 लोगों की उग्र भीड़ ने मतदान केंद्र पर हमला कर दिया था. इस दौरान सीआरपीएफ जवानों के पास न तो लाठी थी और ना ही पैलेट गन, केवल बंदूकें ही थी. सेना नहीं चाहती थी कि वो उग्र भीड़ पर गोलियां चला दे, इसलिए उग्र भीड़ की पत्थरबाजी रोकने के लिए ये तरीका अपनाना पड़ा.

यह तरीका भले ही विवादित लगे लेकिन उस दौरान ये काफी प्रभावी था. इसी तरह से सीआरपीएफ जवानों ने मतदान कर्मियों और ईवीएम दोनों को उग्र भीड़ से सुरक्षित बचा लिया और पत्थरबाजों को रोकने के लिए गोलियां भी नहीं चलानी पड़ी.

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