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ब्रेकिंग– अमेरिका ने दी नेहरू के बारे में ऐसी रिपोर्ट जिसने पूरी दुनिया में मचा दी खलबली

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नई दिल्ली : देश के आजाद होते ही जवाहरलाल नेहरू पहले प्रधानमंत्री बन गए, लेकिन असल मायने में वो प्रधानमन्त्री तो क्या एक चपरासी बनने के लायक भी नहीं थे. ऐसी हम नहीं कह रहे हैं बल्कि ऐसा आप खुद कहेंगे अभी-अभी आयी इस मीडिया रिपोर्ट को पढ़ने के बाद.


नेहरू के कारण भारत से छिन गया “अक्साई चिन”

भारत-चीन के बीच हुए युद्ध में भारत की हार को नेहरू की विफलता तो कई लोग कहते आये हैं लेकिन सीआईए की ये रिपोर्ट पढ़कर तो आपकी आँखें ही फटी रह जाएंगी. आपको बता दें कि हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने एक करोड़ से अधिक पुराने ‘गोपनीय’ दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं. सीआईए के इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद फ्रांसीसी मूल के तिब्बत विशेषज्ञ “क्लाड अर्पी” ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि यदि नेहरू प्रशासन समय रहते सतर्क हो जाता तो चीन कभी “अक्साई चिन” भारत से नहीं छीन पाता.

सीआईए की चेतावनी को किया दरकिनार

“क्लाड अर्पी” की रिपोर्ट के मुताबिक़ भारतीय सरकार को सीआईए की ओर से इस बारे में चेतावनी भी दी गयी थी लेकिन नेहरू की अक्ल पर पत्थर पड़े हुए थे इसलिए उन्होंने इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया. अर्पी के मुताबिक 1953 में सीआईए को पता था कि चीन अपनी सीमा पर भारी संख्या में सैनिक और निर्माण सामग्री जमा कर चुका था. इतना ही नहीं, 1957 में तो एक चीनी अखबार ने ये खबर तक छापी कि चीनी सरकार ने शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने वाली1200 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण कर लिया है, लेकिन नेहरू का ध्यान इस ओर नहीं गया.

चीन भारतीय इलाकों में सड़के बना रहा था, नेहरू आँखें मूंदे बैठे थे

सीआईए की रिपोर्ट के मुताबिक चीनी अखबार कुआंग-मिंग जी-पाओ ने 6 अक्टूबर, 1957 को इस बारे में खबर छापी थी कि दुनिया के सबसे ऊंचे हाईवे शिनजियांग-तिब्बत हाईवे का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है. अखबार ने ये भी बताया था कि इस हाईवे पर ट्रायल के लिए कई दिनों से ट्रक भी दौड़ रहे थे.

इतना ही नहीं तत्कालीन विदेश सचिव ने 1958 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को इस सड़क के भारत के अक्साई चीन इलाके से होकर गुजरने के बारे में बताया तब भी नेहरू के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी. नेहरू तो मानो अपनी ही दुनिया में खोये हुए थे या फिर उनमे रत्तीभर भी राजनीतिक समझ नहीं थी इसलिए उन्हें दिख ही नहीं रहा था कि उनकी नाक के नीचे क्या चल रहा था.

दो साल बाद होश आया नेहरू को

बाद में नेहरू ने 1959 में संसद ये बात स्वीकार भी कर ली कि चीन की ये सड़क भारतीय इलाके से होकर गुजरती है. क्लाड अर्पी के मुताबिक़ इस अत्यंत महत्वपूर्ण खबर को नेहरू तक पहुंचने में करीब दो साल लग गए. इन दो सालों में आईबी के तत्कालीन निदेशक बीएन मलिक को भी इस बात का एहसास तक नहीं हुआ कि चीन ने भारतीय इलाके “अक्साई चिन” में हाइवे बना लिया है.


चीन का हाईवे बन गया, उसके बनने की खबर भी छप गयी उसके भी करीब 5 महीने बाद 1958 में भारतीय विदेश सचिव सुबीमल दत्त ने नेहरू को बताया कि ऐसा लग रहा है कि चीन द्वारा बनाया गया 1200 किलोमीटर लंबा हाईवे भारत के अक्साई चिन से होकर गुजर रहा है.

राजनीतिक समझ का आभाव

हैरानी कि बात तो ये है कि नेहरू को इस बात का पता चलने के बाद भी उन्हें यही लगा कि चीन को इस हाईवे से कोई फायदा होगा ही नहीं. काफी जोर देने के बाद नेहरू ने दबे मन से इलाके के जमीनी निरीक्षण के लिए मंजूरी दी लेकिन अक्साई चिन के हवाई सर्वे को लेकर कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. इतना सब होने के बाद नेहरू ने सुझाव दिया कि भारत चीन को अपना नक्शा भेज दे लेकिन अनौपचारिक तौर पर.

अंत में जब भारतीय सैनिक अक्साई चिन के जमीनी निरीक्षण के लिए गए तो चीनी सैनिकों ने उन्हें मार दिया. इतनी बड़ी घटना के होने के बाद भी 18 अक्टूबर 1958 को भारतीय विदेश सचिव ने चीनी राजदूत को केवल एक ‘अनौपचारिक नोट’ दिया, जिससे हालात पर कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा.

नेहरू ने किया संसद को गुमराह

क्लाड ने अपनी इस रिपोर्ट में नेहरू पर भारत की संसद को गुमराह करने का भी आरोप लगाया है. उन्होंने लिखा है कि 22 अप्रैल 1959 को सांसद बृज राज सिंह ने मीडिया रिपोर्ट के हवाले से संसद में सवाल किया कि चीन ने अपने नक्शे में भारतीय इलाके को चीन का हिस्सा दिखाया है, इस बारे में भारत सरकार क्या कर रही है? तो नेहरू ने जवाब दिया, ‘मैं माननीय संसद सदस्य को सुझाव दूंगा कि वो कभी हॉन्ग कॉन्ग तो कभी कहीं और छपी मीडिया रिपोर्ट पर ज्यादा ध्यान न दिया करें’.

क्लाड ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि अगस्त, 1959 में भारत के प्रधानमन्त्री नेहरू ने संसद में स्वीकार कर लिया कि चीन ने भारत के अक्साई चिन में सड़क बना ली है. यानी एक प्रकार से अक्साई चिन पर चीन की प्रभुसत्ता को नेहरू ने अपनी मौन स्वीकृति दे दी थी. चीन भारत पर कब्जे की योजनाएं बना कर उनपर अमल करता रहा और नेहरू अपनी अय्याशियों में खोये रहे. कहा जाता है कि उन्हें मिले भारत रत्न पुरस्कार के लिए अपना नाम उन्होंने खुद ही रिकमेंड कर दिया था.


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