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कश्मीर में नए सेना चीफ की चेतावनी, सेना पर पत्थरबाजी करने वालों को मार दी जाएगी गोली

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कश्मीर : नोटबंदी के बाद से शांत कश्मीर एक बार फिर से हिंसा की आग में दहकने लगा है. कई महीनों की शान्ति के बाद कश्मीर के पत्थरबाज एक बार फिर सक्रिय होने लगे हैं. अभी हाल ही में कश्मीर में जो हुआ उसे देखकर नए सेना चीफ बिपिन रावत का गुस्सा भी सातवे आसमान पर जा पहुचा.


पत्थरबाजी की तो मार देंगे गोली

नए सेना चीफ बिपिन रावत ने कश्मीर के पत्थरबाजों को चेतावनी दी है कि अब यदि उन्होंने सेना या सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी की तो उन्हें गोली मार दी जायेगी. आपको बता दें कि दो ही दिन पहले बांदीपुरा और हंदवाड़ा में हुए एऩकाउंटर में देश के चार जाबाजों की जान चली गयी और इसकी बड़ी वजह ये रही कि आतंकियों के खिलाफ सुरक्षाबलों की कार्रवाई के वक़्त ये कश्मीरी पत्थरबाज सेना के जवानों पर पत्थरबाजी करके आतंकियों की सहायता कर रहे थे.

आतंकियों को बचाने के लिए पत्थरबाजी

जनरल बिपिन रावत ने साफ़ शब्दों में बताया कि ना केवल कुछ स्थानीय लोग पत्थरबाजी करके आतंकियो के खिलाफ सेना के ऑपरेशन में बाधा डाल रहे हैं बल्कि कई बार तो ये आतंकियों के भागने में सहायता भी कर रहे हैं, जिस कारण सुरक्षाबलों के जवानों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है.


जम्मू कश्मीर में आतंकियों के एनकाउंटर में शहीद जवानों को श्रद्धांजिल देने के बाद सेना प्रमुख ने पत्थरबाजों को चेतावनी देते हुए कहा कि कश्मीर में जो स्थानीय लोग आतंकियों का साथ दे रहे हें उन्हें बख्शा नहीं जाएगा. उनके साथ भी सख्ती से निपटा जाएगा. गौरतलब है कि पिछले साल आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद भी इन पत्थरबाजों ने कश्मीर में जमकर उत्पात मचाया था जिसके बाद सरकार को इन्हें रोकने के लिए पेलेट गन का इस्तमाल करवाना पड़ा था हालांकि भारत के कुछ तथाकथित सेक्युलर मीडिया पत्रकारों और वामपंतियों ने इस बात पर बड़ा बवाल उठाया था.

पत्थरबाजों के मानवाधिकार, सैनिको के नहीं?

ख़बरों के मुताबिक़ सेना प्रमुख ने पीएम मोदी से भी इस बारे में बातचीत की है. ये कैसा दस्तूर है कि कश्मीर के जिन लोगों की हिफाजत के लिए सेना के जवानों ने अपनी जान दे दी, उन्ही में से कुछ आतंकियों के ही दोस्त बने बैठे हैं. ना केवल ये लोग सुरक्षाबलों पर पत्थरों से हमले करते हैं बल्कि जब इनके खिलाफ सेना कोई कार्रवाई करती है तो अपने ही देश के कुछ नेता व् मानवाधिकार समूहों को इससे आपत्ति होने लगती है. इन लोगों को पत्थरबाजों और आतंकियों के मानवाधिकार तो दिखते हैं लेकिन सेना के जवानों के मानवाधिकार और उनके परिवारों के दुःख-दर्द दिखाई ही नहीं देते.


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