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यूपी में अखिलेश सरकार के ऐसे बड़े घोटाले का पर्दाफ़ाश जिसकी कल्पना तक नहीं की होगी आम आदमी ने

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लखनऊ : उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव अपने चरम पर हैं. समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव कांग्रेस के साथ गठबंधन करके वोट बटोरने की पूरी कोशिशों में लगे हुए हैं. लेकिन अभी-अभी एक ऐसी हैरतअंगेज खबर सामने आयी है जिससे यूपी की सियासत में भूचाल आ गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक़ यूपी में अखिलेश सरकार के एक करोड़ों के घोटाले का पर्दाफाश हुआ है.


दिल्ली-यमनोत्री स्टेट हाइवे घोटाला

हिंदी अखबार अमर उजाला में छपी एक खबर के मुताबिक़ उपशा यानी यूपी स्टेट हाईवे अथॉरिटी के तहत एक फोरलेन सड़क बनाने के नाम पर एक बहुत बड़ा घोटाला किया गया है. लगभग 206 किलोमीटर लंबे फोरलेन दिल्ली-यमनोत्री स्टेट हाइवे को बनाने का ठेका जिस कंपनी को दिया गया, उसने कागजों पर हाईवे बनाया और बैंक अधिकारियों की मिलीभगत से यूपी सरकार को 455 करोड़ रुपये का चूना लगा दिया.

1735 करोड़ रुपये की लागत से बनाये जाने वाले इस हाइवे को बनाने का ठेका एसईडब्ल्यू-एलएसवाई हाइवेज लिमिटेड नाम की एक हैदराबाद की निर्माण कम्पनी को दिया गया था. इस हाइवे को बनाने का काम उपशा यानी यूपी स्टेट हाईवे अथॉरिटी द्वारा प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप के आधार पर एसईडब्ल्यू-एलएसवाई हाइवेज लिमिटेड को अप्रैल 2012 में दिया गया था.

अखिलेश सरकार पर आरोप

उस वक़्त तक अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री का पद संभाल चुके थे. हाइवे बनाने के लिए कम्पनी ने बैंक से लोन लिया. काम को बेहद धीमी रफ़्तार से शुरू किया गया क्योंकि शायद कम्पनी को पहले से पता था कि वो काम पूरा किये बिना ही भाग जाने वाले हैं. उपशा के अध्यक्ष मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ही हैं और अखिलेश यादव के बेहद जिगरी आईएएस अधिकारी नवनीत सहगल.इसके सीईओ हैं.


पूर्व आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह ने आरोप लगाए हैं कि अप्रैल में ठेका लेने के बावजूद कंपनी ने सितम्बर तक कुछ ख़ास निर्माण कार्य नहीं किया. बल्कि बैंक से पैसे लेकर नेताओं और अधिकारियों को हाइवे बनाने के ठेके के लिए कमीशन के तौर पर तकरीबन 455 करोड़ रुपये दे दिए. 11 जून 2014 तक भी हाइवे का कोई काम ना होने पर कम्पनी का कॉन्ट्रैक्ट कैंसिल कर दिया जाना चाहिए था लेकिन उपशा ने ऐसा नहीं किया बल्कि रिश्वत और कमीशनखोरी के चलते इस काम की अवधि को 371 दिन और बढ़ा दिया. अवधि बढ़ जाने से कंपनी को 2017 के आखिर तक कार्य ख़त्म करने की अनुमति दे दी गयी.

सूर्य प्रताप सिंह के मुताबिक़ हाइवे का काम नवम्बर 2013 से ही बंद है लेकिन किसी ने सुध नहीं ली. और अब जब उपशा के सीईओ नवनीत सहगल को ये अहसास हुआ कि समाजवादी पार्टी इस बार चुनाव हारने वाली है और बीजेपी सत्ता में आने वाली है तो कल यानी कि 24 फ़रवरी 2017 को एकाएक कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गयी क्योंकि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद इसकी जांच जरूर कराई जायेगी.

सूर्य प्रताप सिंह ने अब कई सवाल खड़े किये हैं.

  • काम ना किये जाने के बावजूद तीन साल तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं कराई गयी?
  • कंपनी की आर्थिक क्षमता का ठीक से अवलोकन किये बिना इतना बड़ा ठेका क्यों दिया गया?
  • समय-समय पर काम की जांच करके कार्य को जांचा-परखा जाता है, इस ठेके में ऐसा क्यों नहीं किया गया?
  • नवम्बर 2013 से हाइवे पर काम नहीं किया जा रहा था तो उसी वक़्त ठेका रद्द क्यों नहीं किया गया?
  • 11 जून 2014 को उपशा ने काम करने की अवधि 371 दिन क्यों और किन परिस्थितियों में बढ़ाया?
  • हाइवे बनाने में लगने वाली लागत को पुनरक्षित क्यों किया गया?
  • कंपनी के बिना काम किये पैसे लेकर भाग जाने से अब इस हाइवे को बनाने में जो दोगुनी लागत आएगी उसका दोषी कौन होगा?
  • केंद्र सरकार ने सुझाव दिया था के इस हाइवे को NHAI को ट्रान्स्फ़र कर दिया जाए तो फिर ऐसा क्यों नहीं किया गया?

सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात तो ये है कि बिकाऊ पत्रकारों के साथ सांठ-गाँठ करके अख़बारों में इस खबर को ऐसे छपवाया गया है कि मानो अखिलेश सरकार दूध की धूलि हो और ये सारा घोटाला केवल बैंक अफसरों और कंपनी की मिलीभगत से किया गया हो. सूर्य प्रताप सिंह ने दावा किया है कि इस घोटाले के तार अखिलेश सरकार और उनके सिंडिकेट अफ़सर नवनीत सहगल से भी जुड़े हैं और यदि उनकी बात गलत है तो अखिलेश यादव और नवनीत सहगल का सिंडिकेट उनके खिलाफ मानहानि का मुक़दमा कर सकता है, वो तैयार हैं.


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